कुशीनगर के जटहा बाजार थाना क्षेत्र में 600 लीटर अवैध डीजल जब्त होने के बावजूद तीन दिन बीतने पर भी प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं हुई है। इस मामले पर कटाई भरपुरवा गांव के ग्रामीणों में भारी आक्रोश है और वे पुलिस-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं।
अवैध डीजल जब्त, पुलिस पर सवाल
रविवार देर रात मंसाछापर (कुशीनगर) के कटाई भरपुरवा गांव में ग्रामीणों ने अपनी सूझबूझ से करीब 600 लीटर अवैध डीजल और दो बाइकें पकड़ीं। यह डीजल कथित तौर पर बिहार में कालाबाजारी (Black Marketing) के लिए ले जाया जा रहा था। ग्रामीणों ने मौके पर ही तस्करों को घेरकर पुलिस के हवाले कर दिया था।
हालांकि, घटना के तीन दिन बाद भी जटहा बाजार थाना पुलिस ने अब तक इस मामले में कोई प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं की है। पुलिस ने सामान तो कब्जे में ले लिया, लेकिन कागजी कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी, जिससे स्थानीय लोगों का गुस्सा और भड़क गया है।
ग्रामीणों के आरोप और अधिकारी का बयान
क्षेत्र के लोगों का गुस्सा दो मुख्य वजहों से चरम पर है:
- किल्लत और कालाबाजारी: ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें खेती और अन्य जरूरी कामों के लिए पंपों पर डीजल-पेट्रोल नहीं मिल रहा है। उनका दावा है कि पंप संचालक मिलीभगत कर ऊंचे दामों पर डीजल की कालाबाजारी (Black Marketing) कर रहे हैं।
- कार्रवाई में ढील: तीन दिन बीत जाने के बाद भी ठोस कार्रवाई न होने से प्रशासन की नीयत पर सवाल उठ रहे हैं।
इस मामले पर पूर्ति निरीक्षक (Supply Inspector) अमरजीत वर्मा ने बताया कि जांच पूरी कर ली गई है। विस्तृत रिपोर्ट जिला पूर्ति अधिकारी (DSO) को भेज दी गई है और उच्चाधिकारियों से निर्देश मिलते ही संबंधित पेट्रोल पंप संचालक व आरोपियों के खिलाफ सख्त वैधानिक कार्रवाई (Legal Action) की जाएगी।
विरोध की चेतावनी, सबकी निगाहें प्रशासन पर
स्थानीय ग्रामीणों ने साफ चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही संबंधित पंप संचालक के खिलाफ मामला दर्ज नहीं किया गया, तो वे विरोध प्रदर्शन (Protest) के लिए मजबूर होंगे। फिलहाल, सबकी निगाहें जिला प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं कि इस गंभीर मामले में कब और क्या कार्रवाई होती है।
विशेषण और विचार (News & Views)
कुशीनगर में 600 लीटर अवैध डीजल की बरामदगी के बावजूद तीन दिन तक प्राथमिकी (FIR) दर्ज न होना, पुलिस-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या यह देरी स्थानीय स्तर पर किसी मिलीभगत का संकेत है, या सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही, जिससे जनता का विश्वास डगमगा रहा है?
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