गोरखपुर एम्स का अदम्य जज़्बा: जब अपनों ने छोड़ा, डॉक्टरों ने दी नई ज़िंदगी
गोरखपुर के एम्स अस्पताल से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो न सिर्फ विज्ञान के चमत्कार को दर्शाती है, बल्कि इंसानियत के जज्बे और कभी न हार मानने वाली डॉक्टरी भावना को भी सलाम करती है। 98 दिनों तक मौत से जूझने वाली एक 20 साल की युवती को एम्स के डॉक्टरों ने नई जिंदगी दी, जबकि उसके अपने ही उसे ‘लाश’ समझकर अस्पताल के बाहर छोड़ गए थे। यह कहानी कुशीनगर की उस बेटी की है, जिसने मौत को मात दी और गोरखपुर एम्स के डॉक्टरों ने साबित कर दिया कि उम्मीद कभी नहीं मरती।
जब जिंदगी और मौत के बीच झूल रही थी युवती
यह चौंकाने वाली घटना इसी साल 19 जनवरी को शुरू हुई। कुशीनगर की रहने वाली इस युवती ने किसी अज्ञात वजह से खेत में इस्तेमाल होने वाला जहरीला कीटनाशक खा लिया। जहर उसके शरीर में इतनी बुरी तरह फैल चुका था कि स्थानीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) और फिर जिला अस्पताल के डॉक्टरों ने भी हाथ खड़े कर दिए। परिवार के लिए यह किसी सदमे से कम नहीं था, जब उनकी आंखों के सामने उनकी बेटी जिंदगी की जंग हारती दिख रही थी। हर तरफ से निराशा मिलने के बाद, परिजन उसे लेकर गोरखपुर एम्स के ट्रॉमा सेंटर पहुंचे।
अपनों ने ही मान लिया ‘मृत’, छोड़ भागे
एम्स के कैजुअल्टी एरिया में पहुंचते ही एक दिल दहला देने वाली स्थिति बनी। युवती की हालत इतनी गंभीर थी कि उसका शरीर ठंडा पड़ चुका था, रक्तचाप (ब्लड प्रेशर) लगभग शून्य था और नब्ज (पल्स) ढूंढने से भी नहीं मिल रही थी। शायद पुलिस केस के डर से या उसे पूरी तरह मृत मानकर, परिजन युवती को स्ट्रेचर के पास लावारिस छोड़कर अस्पताल से भाग निकले। उनके मन में शायद यह डर था कि अब कुछ बचा नहीं, तो कानूनी झमेले में कौन फंसेगा।
एम्स के डॉक्टरों ने दिखाई जिंदगी की ‘हल्की लौ’
लेकिन शायद किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। ड्यूटी पर तैनात डॉक्टरों ने जब युवती की जांच की, तो उन्हें जीवन की एक बेहद हल्की सी किरण दिखाई दी। धड़कनें बहुत मंद थीं, लेकिन पूरी तरह बंद नहीं हुई थीं। डॉक्टरों ने एक पल भी गंवाए बिना तुरंत CPR (कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन) देना शुरू किया। कुछ ही मिनटों में एक चमत्कार हुआ और युवती की सांसें लौट आईं। यह मेडिकल साइंस और डॉक्टरों के समर्पण का अद्भुत उदाहरण था।
मौत से 98 दिनों की जंग और दो बार दिल का दौरा
सांसें लौटने के बाद युवती को तुरंत मेडिकल आईसीयू (ICU) में भर्ती किया गया। उसकी हालत इतनी नाजुक थी कि उसे अगले 48 दिनों तक वेंटिलेटर पर रखना पड़ा। इस लंबी और कठिन लड़ाई के दौरान युवती को दो बार दिल का दौरा (Cardiac Arrest) भी पड़ा। हर बार ऐसा लगा कि अब सब खत्म हो गया, लेकिन डॉ. अरविंद कुमार और डॉ. सुहास मल्ल की टीम ने हार नहीं मानी। हर बार सीपीआर और आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों के जरिए उसे मौत के मुहाने से वापस खींच लाया गया।
डॉ. सुब्रमणियम, डॉ. अनिल मीना, डॉ. शशि सिंह, डॉ. अरुण पांडेय और डॉ. श्रीशा की टीम ने चौबीसों घंटे उसकी कड़ी निगरानी की। शरीर से जहर का असर खत्म करना और सभी अंगों को दोबारा सक्रिय करना एक बहुत बड़ी चुनौती थी, जिसे इस कुशल टीमवर्क ने संभव कर दिखाया।
जब परिजनों को मिला ‘जिंदा’ होने का फोन
एक तरफ अस्पताल में डॉक्टर जान बचाने में लगे थे, दूसरी तरफ परिजन उसे मृत मानकर शोक मना रहे थे। भर्ती के आठवें दिन जब एम्स प्रशासन और पुलिस के दबाव में परिजनों को फोन किया गया कि “आपकी बेटी जिंदा है और उसका इलाज चल रहा है,” तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। परिजन वापस अस्पताल आए, जहां उनकी काउंसलिंग की गई और उन्हें ढांढस बंधाया गया। यह खबर उनके लिए किसी सदमे से कम नहीं थी, लेकिन एक सुखद सदमा।
निःशुल्क इलाज: एम्स गोरखपुर की मानवीय पहल
यह गरीब परिवार इतने लंबे और महंगे इलाज का खर्च उठाने में सक्षम नहीं था। लेकिन गोरखपुर एम्स की कार्यकारी निदेशक डॉ. विभा दत्ता के निर्देश पर अस्पताल प्रशासन ने एक बड़ा और मानवीय फैसला लिया। युवती का पूरा इलाज, सभी दवाइयां और जरूरी टेस्ट पूरी तरह मुफ्त किए गए। एम्स ने अपने आंतरिक संसाधनों से सारा खर्च उठाया, ताकि एक अनमोल जिंदगी को बचाया जा सके। आखिरकार, 26 अप्रैल को वह ऐतिहासिक दिन आया जब युवती पूरी तरह स्वस्थ होकर अपने पैरों पर चलकर अस्पताल से डिस्चार्ज हुई।
डॉक्टरों का संदेश: “हम कभी हार नहीं मानते”
इस अद्भुत सफलता पर डॉ. विभा दत्ता ने कहा, “एम्स के डॉक्टर कभी हार नहीं मानते। यह केस हमारे डॉक्टरों के समर्पण और टीमवर्क का प्रमाण है। हमने केवल इलाज नहीं किया, बल्कि परिजनों को भी मानसिक रूप से इस स्थिति के लिए तैयार किया।”
आज वह युवती अपने कुशीनगर स्थित घर पर नई जिंदगी का जश्न मना रही है। यह केवल एक मेडिकल केस नहीं, बल्कि उन सभी के लिए एक प्रेरणा है जो विपरीत परिस्थितियों में हिम्मत हार जाते हैं। गोरखपुर एम्स के इन ‘धरती के भगवानों’ ने साबित कर दिया कि जहां उम्मीद खत्म होती है, वहीं से कभी-कभी असली चमत्कार शुरू होते हैं।
मायने और प्रभाव: क्यों यह खबर आपके लिए अहम है?
- जीवन की कीमत: यह घटना दिखाती है कि हर जिंदगी कितनी अनमोल है, भले ही परिस्थितियाँ कितनी भी विकट क्यों न हों। एम्स के डॉक्टरों ने यह साबित किया कि जब तक सांस है, उम्मीद है। यह हमें सिखाता है कि किसी भी मरीज को इतनी आसानी से ‘छोड़’ नहीं देना चाहिए।
- चिकित्सा पर विश्वास: यह कहानी आम जनता का बड़े सरकारी अस्पतालों, खासकर एम्स जैसे संस्थानों पर विश्वास मजबूत करती है। यह बताता है कि कैसे अत्याधुनिक सुविधाएं और समर्पित डॉक्टर मिलकर असंभव को भी संभव बना सकते हैं, खासकर जब पैसे की कमी आड़े आती है।
- मानवीय संवेदनशीलता: परिजनों द्वारा युवती को छोड़ जाने की घटना समाज में व्याप्त डर और अज्ञानता को उजागर करती है। यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम पुलिस के डर या अंतिम उम्मीद खो देने पर अपनों का साथ छोड़ देते हैं? वहीं, एम्स का निःशुल्क इलाज का फैसला मानवीय संवेदनशीलता का उत्कृष्ट उदाहरण है।
- गोरखपुर एम्स की क्षमता: यह घटना गोरखपुर एम्स की उच्च स्तरीय चिकित्सा क्षमता और आपातकालीन सेवाओं की दक्षता को दर्शाती है। यह बताता है कि पूर्वांचल और पश्चिमी बिहार के लोगों के लिए गोरखपुर एम्स कितना महत्वपूर्ण है, जहाँ गंभीर से गंभीर मामलों का भी सफल इलाज संभव है। यह स्थानीय लोगों के लिए गर्व और विश्वास का विषय है।
- मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता: युवती द्वारा कीटनाशक का सेवन मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों की ओर भी इशारा करता है। यह हमें याद दिलाता है कि अवसाद या किसी भी मानसिक परेशानी से जूझ रहे लोगों की मदद करना कितना जरूरी है, ताकि ऐसी दुखद घटनाएं रोकी जा सकें।



