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पश्चिम बंगाल: ममता बनर्जी की किताबों पर ‘कैंची’, सरकारी पुस्तकालयों से हटेगी ‘एपांग ओपांग झपांग’

पश्चिम बंगाल: ममता बनर्जी की किताबों पर ‘कैंची’, सरकारी पुस्तकालयों से हटेगी ‘एपांग ओपांग झपांग’

पश्चिम बंगाल की राजनीति में अब किताबों पर संग्राम छिड़ गया है। एक तरफ जहां साहित्य समाज को जोड़ने का काम करता है, वहीं अब इन्हीं किताबों को हटाने का फरमान जारी हुआ है। यह फैसला किसी और की नहीं, बल्कि पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की रचनाओं को लेकर है, जिसने राज्य में एक नई बहस छेड़ दी है।

नवनिर्वाचित पश्चिम बंगाल सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए राज्य के सभी सरकारी पुस्तकालयों से ममता बनर्जी द्वारा लिखित किताबों को हटाने का ऐलान किया है। इस फैसले से राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है, और कई सवाल उठ रहे हैं।

किताबें हटाने का ऐलान: क्या है पूरा मामला?

हाल ही में पश्चिम बंगाल के सार्वजनिक पुस्तकालय मंत्री गौरीशंकर घोष ने यह घोषणा की है। उन्होंने बताया कि सरकारी पुस्तकालयों में ममता बनर्जी की जो किताबें उपलब्ध हैं, उन्हें अब हटा दिया जाएगा। इस निर्णय को राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद एक महत्वपूर्ण बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है।

मंत्री घोष ने स्पष्ट किया कि यह कदम किसी राजनीतिक द्वेष से प्रेरित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य पुस्तकालयों में ‘निष्पक्ष और गुणवत्तापूर्ण’ साहित्य उपलब्ध कराना है। हालांकि, आलोचक इसे राजनीतिक प्रतिशोध की कार्रवाई बता रहे हैं और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला मान रहे हैं।

‘एपांग ओपांग झपांग’ पर संकट

ममता बनर्जी की कई किताबें हैं, लेकिन उनकी बच्चों के लिए लिखी गई कविता संग्रह ‘एपांग ओपांग झपांग’ काफी लोकप्रिय है। इस किताब को बच्चों के बीच खूब पसंद किया जाता रहा है और यह उनकी रचनात्मकता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।

अब यह लोकप्रिय रचना भी सरकारी पुस्तकालयों की अलमारियों से हटाई जाएगी, जिससे कई साहित्य प्रेमी और पाठक मायूस हैं। यह किताब एक समय में काफी चर्चा में रही थी और अब इसका हटना सांस्कृतिक और साहित्यिक जगत में एक नई बहस को जन्म दे रहा है।

राजनीतिक विवाद की नई कड़ी

पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी और उनके विरोधियों के बीच हमेशा तीखी बयानबाजी और टकराव देखने को मिलता रहा है। यह किताबों को हटाने का फैसला उसी राजनीतिक खींचतान की एक नई कड़ी है, जो राज्य में लंबे समय से चली आ रही है।

कोलकाता और आसपास के जिलों में इस फैसले को लेकर आम जनता के बीच भी अलग-अलग राय देखने को मिल रही है। कुछ लोग इसे ‘बदले की राजनीति’ बता रहे हैं, तो कुछ इसे ‘सही कदम’ मान रहे हैं ताकि सरकारी संसाधनों का उपयोग ‘गैर-राजनीतिक’ सामग्री के लिए हो।

मायने और प्रभाव

यह फैसला सिर्फ किताबों को हटाने भर का नहीं है, बल्कि इसके गहरे राजनीतिक और सामाजिक मायने हैं। सबसे पहले, यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सांस्कृतिक विरासत पर सवाल खड़े करता है। क्या किसी राजनीतिक दल के सत्ता में आने के बाद पिछली सरकार के मुखिया की साहित्यिक रचनाओं को हटाना उचित है?

यह कदम भविष्य में एक खतरनाक मिसाल कायम कर सकता है, जहां हर नई सरकार अपने पूर्ववर्ती के सांस्कृतिक और साहित्यिक योगदान को मिटाने की कोशिश करेगी। इससे साहित्य का राजनीतिकरण होगा और पुस्तकालयों जैसे सार्वजनिक संस्थानों की निष्पक्षता पर भी आंच आएगी। आम जनता के लिए इसका मतलब है कि उन्हें विविध विचारों और रचनाओं तक पहुंच से वंचित किया जा सकता है, जो एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। यह घटना पश्चिम बंगाल की राजनीति में बढ़ती कटुता को भी दर्शाती है, जिसका असर राज्य के सामाजिक ताने-बाने और बौद्धिक वातावरण पर पड़ सकता है।

Image Source: news.google.com

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