मध्य-पूर्व में गाजा पट्टी पर जारी भीषण संघर्ष ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया है। हर दिन आ रही हृदय विदारक तस्वीरें और खबरें मानवता को शर्मसार कर रही हैं। लेकिन अब यह संवेदनशील मुद्दा भारत की घरेलू राजनीति में भी एक नया तूफान खड़ा कर रहा है। कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने गाजा को लेकर भारत के रुख पर सवाल उठाते हुए एक तीखा लेख लिखा है, जिसके बाद सत्ताधारी भाजपा ने उन पर जमकर पलटवार किया है।
सोनिया गांधी का कड़ा प्रहार: ‘भारत की चुप्पी निंदनीय’
सोनिया गांधी ने अपने लेख में गाजा में बच्चों की मौत पर गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि गाजा में बच्चों को ‘खत्म करने की कोशिश’ की जा रही है। सोनिया गांधी ने इस मामले पर भारत की चुप्पी को ‘निंदनीय और समझ से परे’ बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत अकेला ऐसा देश है जिसने इस मानवीय संकट पर चुप्पी साध रखी है, जबकि दुनिया इजरायल से दूर जा रही है। उनका मानना है कि मोदी सरकार का यह रुख भारत की दशकों पुरानी विदेश नीति से हटकर है, जो फिलिस्तीनी हितों का समर्थन करती रही है।
भाजपा का पलटवार: ‘विपक्ष विदेश नीति पर राजनीति न करे’
सोनिया गांधी के इस लेख के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने तुरंत मोर्चा संभाल लिया। भाजपा नेताओं ने सोनिया गांधी पर विदेश नीति जैसे संवेदनशील मुद्दे पर राजनीति करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को देश की विदेश नीति को कमजोर करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। भाजपा का तर्क है कि भारत सरकार हमेशा से संतुलन साधकर चलती रही है और राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखती है। उनका कहना है कि विपक्ष को अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की स्थिति को लेकर गैर-जिम्मेदाराना बयानबाजी से बचना चाहिए।
क्या है भारत का आधिकारिक रुख?
भारत ने गाजा में नागरिक हताहतों पर चिंता व्यक्त की है और मानवीय सहायता की अपील की है। हालांकि, भारत ने इजरायल के आत्मरक्षा के अधिकार को भी मान्यता दी है, लेकिन साथ ही फिलिस्तीनी लोगों के राज्य के अधिकार का भी समर्थन किया है। यह एक जटिल संतुलनकारी कार्य है, जिसमें भारत दोनों पक्षों के साथ अपने ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंधों को बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। सरकार का कहना है कि वह हिंसा में कमी और स्थायी शांति के लिए काम कर रही है, जिसमें दो-राज्य समाधान (Two-State Solution) शामिल है।
मायने और प्रभाव: भारत की विदेश नीति और घरेलू सियासत
सोनिया गांधी का यह लेख सिर्फ एक राजनीतिक बयानबाजी से कहीं बढ़कर है। इसके कई गहरे मायने और दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं:
- अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि: गाजा मुद्दे पर भारत के रुख को लेकर विपक्ष द्वारा सवाल उठाने से अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में भारत की स्थिति पर बहस छिड़ सकती है, खासकर ग्लोबल साउथ के देशों के बीच, जहां भारत ऐतिहासिक रूप से फिलिस्तीन का समर्थक रहा है।
- घरेलू राजनीति पर असर: कांग्रेस इस मुद्दे को उठाकर मोदी सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है, खासकर अल्पसंख्यक समुदाय और मानवीय सरोकारों से जुड़े मतदाताओं के बीच। यह आने वाले चुनावों में एक राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।
- विदेश नीति की चुनौती: भारत के लिए यह एक कूटनीतिक चुनौती है। उसे अपने ऐतिहासिक संबंधों और मानवीय मूल्यों के साथ-साथ इजरायल के साथ अपने बढ़ते रणनीतिक और आर्थिक संबंधों के बीच संतुलन साधना है। सोनिया गांधी के लेख ने इस संतुलन पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
- विपक्ष की भूमिका: यह घटना दिखाती है कि विपक्ष अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को भी घरेलू राजनीति का हिस्सा बनाने से नहीं हिचकेगा। यह भारत की विदेश नीति पर एक स्वस्थ बहस का अवसर भी हो सकता है, लेकिन इसमें गैर-जिम्मेदाराना बयानबाजी से बचना जरूरी है।
कुल मिलाकर, गाजा का संकट अब भारत की सीमाओं के भीतर भी एक राजनीतिक युद्ध का मैदान बन गया है। यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस आलोचना का जवाब कैसे देती है और यह मुद्दा आने वाले समय में देश की राजनीति और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर क्या असर डालता है।
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