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पंडवानी की साम्राज्ञी शांत: ‘तीजन बाई, इंडिया’ तक पहुंची थी पेरिस की चिट्ठी, राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई

पंडवानी की बुलंद आवाज हुई खामोश

छत्तीसगढ़ की माटी से निकली, पंडवानी की वो बुलंद आवाज, जो अपने आप में एक पूरा युग थी, अब शांत हो गई है। पद्म विभूषण तीजन बाई ने अंतिम सांस ली और उन्हें राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। उनके निधन से लोक कला जगत में एक ऐसी रिक्तता आ गई है, जिसे भर पाना मुश्किल होगा।

पंडवानी की विश्व विख्यात गायिका, पद्म विभूषण तीजन बाई का निधन हो गया है। उनके पार्थिव शरीर को राजकीय सम्मान के साथ पंचतत्व में विलीन किया गया। इस दौरान हजारों की संख्या में कलाप्रेमी, प्रशंसक और गणमान्य व्यक्ति उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचे। ‘चोला माटी के हे राम’ जैसे उनके गाए भजन आज भी लोगों की जुबान पर हैं, जो उनकी कला की अमरता का प्रतीक हैं।

‘तीजन बाई, इंडिया’ तक पहुंची थी पहचान

तीजन बाई सिर्फ एक गायिका नहीं थीं, बल्कि भारतीय लोक कला की वैश्विक पहचान थीं। उनकी प्रसिद्धि का आलम यह था कि एक बार पेरिस से ‘तीजन बाई, इंडिया’ के पते पर भेजी गई एक चिट्ठी सीधे उन तक पहुंच गई थी। यह घटना उनकी असाधारण लोकप्रियता और कला के प्रति अटूट समर्पण का प्रमाण है, जिसने उन्हें देश की सीमाओं से परे एक अलग मुकाम दिया।

तेरह साल की उम्र में मंच पर धमाका

तीजन बाई को पंडवानी की प्रेरणा अपने नाना से मिली थी। मात्र 13 साल की उम्र में उन्होंने मंच पर पंडवानी का प्रदर्शन शुरू कर दिया था। उनकी दमदार आवाज, अभिनय और महाभारत की कहानियों को जीवंत कर देने की क्षमता ने उन्हें बहुत जल्द ही दर्शकों का चहेता बना दिया। उन्होंने अपनी कला से पंडवानी को पुरुषों के एकाधिकार से बाहर निकालकर महिलाओं के लिए भी एक सशक्त माध्यम बनाया।

जमशेदपुर से गहरा नाता

झारखंड के जमशेदपुर शहर से भी तीजन बाई का गहरा नाता रहा है। उनके कई यादगार प्रवास आज भी वहां के कला प्रेमियों के दिलों में जिंदा हैं। वे अक्सर जमशेदपुर के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में शिरकत करती थीं और अपनी प्रस्तुतियों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती थीं। उनकी यादें जमशेदपुर के कला जगत में हमेशा बनी रहेंगी।

मायने और प्रभाव

तीजन बाई का निधन सिर्फ एक कलाकार का जाना नहीं, बल्कि भारतीय लोक कला के एक स्वर्णिम अध्याय का समापन है। उन्होंने पंडवानी को छत्तीसगढ़ के गांवों से निकालकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पहचान दिलाई। उनकी कला ने न केवल महाभारत की कहानियों को नई पीढ़ी तक पहुंचाया, बल्कि पंडवानी को एक जीवित और विकासशील कला रूप बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उनका जीवन संघर्ष, समर्पण और अदम्य साहस की कहानी है। एक ग्रामीण पृष्ठभूमि से आकर पद्म विभूषण तक का सफर तय करना, कई महिलाओं और कलाकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। तीजन बाई ने दिखाया कि कला की कोई सीमा नहीं होती और सच्ची प्रतिभा को कोई रोक नहीं सकता। उनकी विरासत पंडवानी के कलाकारों को हमेशा प्रेरित करती रहेगी और उनकी आवाज युगों तक गूंजती रहेगी।

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