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मथुरा में मौत के PG और हॉस्टल? दिल्ली हादसे के बाद छात्रों की सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल!

दिल्ली के सत्य निकेतन में हॉस्टल ढहने की दर्दनाक घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है। इस हादसे ने एक बार फिर उन ‘मौत के ठिकानों’ पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जो शहरों में छात्रों को कथित तौर पर सुरक्षित छत मुहैया कराते हैं। लेकिन क्या हमारी सांस्कृतिक नगरी मथुरा-वृंदावन में भी ऐसे ही खतरे मंडरा रहे हैं?

दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में हाल ही में एक चार मंजिला हॉस्टल अचानक भरभराकर गिर गया। इस भीषण हादसे में कई छात्र घायल हुए और कुछ की जान भी चली गई। यह घटना सिर्फ दिल्ली की नहीं, बल्कि देश के उन तमाम शहरों के लिए एक चेतावनी है, जहाँ हजारों छात्र पढ़ाई के लिए आते हैं और असुरक्षित पीजी या हॉस्टलों में रहने को मजबूर हैं।

अब सवाल उठता है कि क्या मथुरा-वृंदावन में भी ऐसे ही हॉस्टल और पीजी बेखौफ चल रहे हैं, जहाँ छात्रों की सुरक्षा भगवान भरोसे है? यहाँ के बीएसए कॉलेज रोड, कृष्ण नगर, महोली रोड और गोवर्धन रोड जैसी घनी आबादी वाली जगहों पर सैकड़ों ऐसे आवासीय मकान हैं, जिन्हें बिना किसी मानक के पीजी या हॉस्टल में बदल दिया गया है।

दिल्ली का दर्द, मथुरा का डर

मथुरा में हर साल हजारों छात्र देश के कोने-कोने से उच्च शिक्षा के लिए आते हैं। इन छात्रों में से अधिकतर लोग इन्हीं पीजी और हॉस्टलों में रहते हैं। अक्सर ये इमारतें पुरानी होती हैं, जिनमें सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं होते। न अग्निशमन की पुख्ता व्यवस्था, न आपातकालीन निकास और न ही मजबूत ढाँचा।

स्थानीय प्रशासन और नगर निगम की ढिलाई के चलते ये पीजी और हॉस्टल नियमों को ताक पर रखकर चलाए जा रहे हैं। कई बार तो एक छोटे से कमरे में चार से पाँच छात्रों को ठूँस दिया जाता है, जिससे वहाँ रहने की बुनियादी सुविधाएँ भी नहीं मिल पातीं।

क्या ‘राम भरोसे’ है छात्रों की सुरक्षा?

इन अनाधिकृत पीजी और हॉस्टलों में सुरक्षा के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति होती है। आग लगने की स्थिति में क्या होगा? भूकंप या किसी अन्य प्राकृतिक आपदा में छात्रों की जान कैसे बचेगी? इन सवालों के जवाब शायद किसी के पास नहीं हैं। ये इमारतें कभी भी बड़े हादसे का सबब बन सकती हैं।

दिल्ली की घटना के बाद मथुरा प्रशासन को तुरंत इन पीजी और हॉस्टलों की जाँच करनी चाहिए। सुरक्षा मानकों का पालन न करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई और छात्र ऐसी लापरवाही का शिकार न हो।

प्रशासन की नींद कब टूटेगी?

यह सिर्फ छात्रों की सुरक्षा का मामला नहीं है, बल्कि मथुरा जैसे धार्मिक और शैक्षिक केंद्र की छवि का भी सवाल है। अगर यहाँ छात्रों को असुरक्षित माहौल मिलेगा, तो शायद वे यहाँ आने से कतराएँगे, जिसका सीधा असर शहर की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।

मायने और प्रभाव

यह खबर मथुरा-वृंदावन के हर उस परिवार के लिए बेहद अहम है, जिसके बच्चे इन पीजी या हॉस्टलों में रहते हैं। दिल्ली का हादसा दिखाता है कि ऐसी लापरवाही कितनी भारी पड़ सकती है। अगर प्रशासन ने जल्द कदम नहीं उठाए, तो मथुरा में भी ऐसी ही दर्दनाक घटना होने का खतरा बना रहेगा।

छात्रों की सुरक्षा सीधे तौर पर उनके भविष्य और उनके परिवारों की उम्मीदों से जुड़ी है। असुरक्षित माहौल में रहने वाले छात्र मानसिक तनाव में भी रहते हैं। इस स्थिति में, स्थानीय लोगों और अभिभावकों को भी प्रशासन पर दबाव बनाना चाहिए कि वे इन अवैध और असुरक्षित ठिकानों पर लगाम कसें।

लंबे समय से चली आ रही इस अनदेखी को अब खत्म करने का समय आ गया है। नगर निगम और जिला प्रशासन को एक विशेष अभियान चलाकर सभी पीजी और हॉस्टलों की जाँच करनी चाहिए, सुरक्षा मानकों को सुनिश्चित करना चाहिए और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। तभी मथुरा के छात्र खुद को सुरक्षित महसूस कर पाएंगे।

Image Source: www.amarujala.com

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