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करवा चौथ पर बड़ा असमंजस: क्या शुक्र के बालत्वकाल में नवविवाहिताएं रख सकती हैं व्रत? कानपुर के ज्योतिषियों में मतभेद

करवा चौथ का त्योहार हर सुहागिन के लिए खास होता है, पति की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए रखा जाने वाला यह व्रत गहरी आस्था का प्रतीक है। लेकिन इस साल कानपुर और आसपास के इलाकों की नवविवाहित महिलाओं के मन में एक बड़ा सवाल उठ रहा है। क्या शुक्र के ‘बालत्वकाल’ में वे यह पवित्र व्रत रख सकती हैं? इस सवाल पर शहर के ज्योतिष विद्वानों की अलग-अलग राय ने असमंजस को और बढ़ा दिया है, जिससे व्रत रखने को लेकर दुविधा की स्थिति बनी हुई है।

नवविवाहितों के व्रत पर ज्योतिषीय मतभेद

दरअसल, कुछ समय से यह चर्चा जोरों पर थी कि नवंबर 2025 से जुलाई 2026 के बीच जिन महिलाओं का विवाह हुआ है, वे शुक्र के बालत्वकाल के कारण करवा चौथ, बरगदाही या अन्य चतुर्थी व्रत नहीं रख सकतीं। इस बात ने कई नवविवाहितों और उनके परिवारों को चिंता में डाल दिया था, क्योंकि वे अपने पहले बड़े व्रत को लेकर संशय में थे।

श्री ब्रह्मावर्त विद्वतपरिषद का स्पष्टीकरण: व्रत रखना शास्त्रसम्मत

इस गंभीर धार्मिक और सामाजिक विषय पर कानपुर की प्रतिष्ठित श्री ब्रह्मावर्त विद्वतपरिषद ने अपनी राय स्पष्ट की है। परिषद के महामंत्री आचार्य चंद्र प्रकाश त्रिपाठी ने बताया कि सर्वसम्मत और शास्त्रीय व्यवस्थाओं के आधार पर यह निर्णय लिया गया है कि शुक्र के बालत्वकाल में भी नवविवाहिताएं चतुर्थी व्रत, करवा चौथ और बरगदाही जैसे महत्वपूर्ण व्रत रख सकती हैं।

आचार्य त्रिपाठी के अनुसार, शास्त्रों में इस मसले पर गहराई से विचार किया गया है और यह पाया गया है कि व्रत रखने में कोई दोष नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि करवा चौथ जैसे व्रत नियत समय पर ही होते हैं और इन्हें आगे-पीछे नहीं किया जा सकता। ये व्रत स्त्री के अधिकार के तहत आते हैं।

परिषद का यह भी मानना है कि गुरु या शुक्र के अस्त होने पर भी व्रत रखने में कोई दोष नहीं होता। ‘निर्णय सिंधु’ और ‘संहिता प्रदीप’ जैसे प्राचीन ग्रंथों में यह स्पष्ट कहा गया है कि बृहस्पति और शुक्र के उदय होने पर उनका बालत्वकाल शुभ ही माना गया है। यह जानकारी उन महिलाओं के लिए राहत भरी हो सकती है जो असमंजस में थीं।

वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य की अलग राय: बालत्वकाल में मनाही

हालांकि, कानपुर के ही वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य पंडित पी.एन. द्विवेदी की राय इससे कुछ अलग है। उनका कहना है कि शुक्र का उदय 28 अक्टूबर को होगा और इसके बाद तीन दिनों तक ‘बालत्वकाल’ रहता है। पंडित द्विवेदी के अनुसार, इस अवधि में नवविवाहित महिलाओं को व्रत रखने की मनाही है।

पंडित द्विवेदी का यह बयान उन नवविवाहितों के लिए और भी संशय पैदा कर रहा है जो व्रत रखने की तैयारी कर रही हैं। यह स्थिति बताती है कि ज्योतिषीय मतों में भी इस विषय पर एकरूपता नहीं है, जिससे आम लोगों के लिए सही निर्णय लेना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

मायने और प्रभाव: आम जनता के लिए क्यों जरूरी है यह खबर?

यह खबर कानपुर और आसपास के क्षेत्रों की उन हजारों नवविवाहित महिलाओं और उनके परिवारों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, जो अपने पहले करवा चौथ या अन्य महत्वपूर्ण व्रतों को लेकर गंभीर असमंजस में हैं। एक तरफ जहां श्री ब्रह्मावर्त विद्वतपरिषद शास्त्रों का हवाला देते हुए व्रत रखने को सही बता रही है, वहीं दूसरी ओर एक वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य की मनाही ने मामले को और जटिल बना दिया है।

इस मतभेद का सीधा असर उन घरों पर पड़ेगा जहां नई-नई शादियां हुई हैं। कई महिलाएं अपनी धार्मिक भावनाओं और परंपराओं के बीच फंस सकती हैं, यह तय नहीं कर पा रही होंगी कि उन्हें क्या करना चाहिए। ऐसे में, यह खबर उन्हें इस ज्योतिषीय बहस से अवगत कराती है और उन्हें अपने पारिवारिक गुरु या स्थानीय विश्वसनीय विद्वानों से सलाह लेकर ही कोई अंतिम निर्णय लेने में मदद करेगी। यह स्थिति दिखाती है कि धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिषीय गणनाओं की व्याख्या में कितनी विविधता हो सकती है, और आम लोगों को सही जानकारी तक पहुंचने में कितनी मशक्कत करनी पड़ती है।

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