गोरखपुर की चिल्लूपार विधानसभा सीट, जिसे ‘बाहुबली’ हरिशंकर तिवारी का अभेद्य किला माना जाता रहा है, वहां एक बार फिर सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने इस हाई-प्रोफाइल सीट से एक ऐसे चेहरे पर दांव खेला है, जिसकी अपनी एक अलग पहचान है – अस्मिता चंद। उनका नाम चर्चा में इसलिए है क्योंकि उनकी राजनीतिक यात्रा न सिर्फ दिलचस्प है, बल्कि अपने ही परिवार के खिलाफ संघर्ष की कहानी भी कहती है।
चिल्लूपार विधानसभा सीट से पांच बार विधायक रह चुके हरिशंकर तिवारी का नाम उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसी परिचय का मोहताज नहीं है। यह सीट दशकों से उनके परिवार के दबदबे का गवाह रही है। अब बसपा ने अस्मिता चंद को अपना प्रत्याशी बनाकर इस पारंपरिक गढ़ में एक नई चुनौती पेश की है।
अस्मिता चंद: परिवार से जुदा सियासी राह
अस्मिता चंद खुद भी एक बड़े राजनीतिक घराने से आती हैं। लेकिन उनकी सबसे खास बात यह है कि उनकी सियासी राहें अक्सर अपने परिवार की पारंपरिक सोच से हटकर रही हैं। उनकी यह जुदा सोच ही उन्हें सुर्खियों में लाती रही है।
साल 2007 के विधानसभा चुनावों में अस्मिता ने अपने ही ससुर के खिलाफ ताल ठोक दी थी। यह फैसला तब भी राजनीतिक गलियारों में खूब चर्चा का विषय बना था और उनके जुझारू तेवर को दर्शाता है। यह घटना उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा और अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने की प्रवृत्ति को स्पष्ट करती है।
बीजेपी से BSP तक का सफर
हाल के दिनों में अस्मिता चंद भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) से टिकट पाने की उम्मीद लगाए बैठी थीं। माना जा रहा था कि वह गोरखपुर क्षेत्र में बीजेपी के लिए एक मजबूत चेहरा बन सकती हैं, लेकिन उनकी यह मंशा पूरी नहीं हो सकी।
जब उनकी बीजेपी से उम्मीदें टूट गईं, तो उन्होंने बहुजन समाज पार्टी का दामन थाम लिया। बसपा ने उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि, जुझारू छवि और स्थानीय पकड़ को देखते हुए उन्हें चिल्लूपार से अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है। यह कदम बसपा की रणनीति का एक अहम हिस्सा माना जा रहा है।
मायने और प्रभाव: क्यों अहम है यह फैसला?
बसपा का यह फैसला चिल्लूपार की राजनीति में कई समीकरणों को बदलने वाला साबित हो सकता है। बसपा ने एक ऐसे उम्मीदवार को चुना है, जो न केवल एक मजबूत राजनीतिक परिवार से आती हैं, बल्कि जिनके पास अपने दम पर चुनाव लड़ने का अनुभव भी है। अस्मिता चंद की उम्मीदवारी से चिल्लूपार में मुकाबला और भी दिलचस्प हो जाएगा।
यह कदम दिखाता है कि बसपा ब्राह्मण वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है, खासकर ऐसे समय में जब हरिशंकर तिवारी का राजनीतिक प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा है। अस्मिता चंद की उम्मीदवारी से भाजपा और समाजवादी पार्टी (सपा) के लिए भी नई चुनौतियां खड़ी होंगी। यह देखना होगा कि क्या वह अपने परिवार की विरासत और अपनी जुझारू छवि के दम पर इस बाहुबली के गढ़ में बसपा के लिए नई जमीन तैयार कर पाती हैं या नहीं। स्थानीय जनता के लिए यह चुनाव सिर्फ एक सीट का नहीं, बल्कि बदलते सियासी मिजाज का पैमाना भी होगा।
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