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जामिया में छात्रसंघ चुनाव की जंग: भूख हड़ताल, हंगामा और दिल्ली की गूँज

दिल्ली की प्रतिष्ठित जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में छात्रों का गुस्सा एक बार फिर उबाल पर है। लगभग दो दशक से शांत पड़ा छात्रसंघ चुनाव का मुद्दा अब भूख हड़ताल और विरोध प्रदर्शनों के साथ सड़क पर आ गया है, जिसने परिसर के साथ-साथ राष्ट्रीय राजधानी का भी ध्यान खींचा है। छात्र अपनी लोकतांत्रिक आवाज बहाल करने की मांग कर रहे हैं, जबकि प्रशासन इसे परिसर की शांति भंग करने वाला बता रहा है।

क्यों सुलग रही है जामिया में आंदोलन की आग?

जामिया मिलिया इस्लामिया में छात्रसंघ चुनाव आखिरी बार 2006 में हुए थे। तब से लेकर आज तक छात्रों को अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार नहीं मिला है। छात्रों का कहना है कि इसके अभाव में उनकी समस्याओं को सुनने और उनका समाधान करने वाला कोई मंच नहीं है। उनकी मांगें अक्सर अनसुनी रह जाती हैं, जिससे उनमें गहरा असंतोष है।

हालिया आंदोलन की शुरुआत छात्र यासिर फहद की भूख हड़ताल से हुई, जो लगभग 19 दिनों तक चली। यासिर को बाद में अस्पताल में भर्ती कराया गया। उनकी बिगड़ती तबीयत के बावजूद छात्रों का संकल्प कम नहीं हुआ है और उन्होंने अपनी मांगें पूरी होने तक संघर्ष जारी रखने का ऐलान किया है।

क्या हैं छात्रों की मुख्य मांगें?

  • छात्रसंघ चुनाव की बहाली: सबसे प्रमुख मांग जामिया में तत्काल छात्रसंघ चुनाव कराना है, ताकि छात्रों को लोकतांत्रिक तरीके से अपना नेतृत्व चुनने का मौका मिले।
  • छात्रों के प्रतिनिधित्व का अधिकार: उनका मानना है कि छात्रसंघ के बिना उनकी आवाज को उचित मंच नहीं मिल पाता।
  • सुरक्षा और अधिकारों का सम्मान: छात्रों का आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान उनके साथ मारपीट की गई और उनकी ‘क्रांति निकालने’ की धमकी दी गई, जो उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है।

प्रशासन का रुख़ और आरोप-प्रत्यारोप

जामिया प्रशासन ने भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों को परिसर से हटाया है, जिसके बाद हंगामा और विरोध प्रदर्शन और बढ़ गया। प्रशासन का कहना है कि यह कदम छात्रों के स्वास्थ्य और परिसर में शांति बनाए रखने के लिए उठाया गया था। हालांकि, छात्रों ने आरोप लगाया है कि उनके साथ बल प्रयोग किया गया और उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया गया।

विश्वविद्यालय ने इस पूरे मामले की जांच के लिए एक कमेटी का गठन किया है। प्रशासन का कहना है कि वह छात्रों की मांगों पर विचार कर रहा है, लेकिन परिसर में किसी भी तरह की अशांति बर्दाश्त नहीं की जाएगी। वहीं छात्रों का कहना है कि कमेटियां केवल मामले को टालने का बहाना हैं और वे ठोस कार्रवाई चाहते हैं।

अन्य विश्वविद्यालयों से मिल रहा समर्थन

जामिया के छात्रों के इस आंदोलन को देश के अन्य प्रमुख विश्वविद्यालयों से भी समर्थन मिल रहा है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के छात्र भी जामिया के आंदोलन को धार दे रहे हैं और यासिर फहद के दिल्ली पहुंचने पर उनसे मुलाकात कर एकजुटता दिखाई। यह दिखाता है कि छात्रसंघ चुनाव का मुद्दा केवल जामिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह छात्र राजनीति और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा एक बड़ा सवाल है।

मायने और प्रभाव: छात्र राजनीति का भविष्य और लोकतांत्रिक मूल्यों की कसौटी

जामिया मिलिया इस्लामिया में छात्रों का यह आंदोलन सिर्फ एक विश्वविद्यालय का मामला नहीं है। यह भारत में छात्र राजनीति के भविष्य और उच्च शिक्षा संस्थानों में लोकतांत्रिक मूल्यों की कसौटी है। लगभग दो दशकों से छात्रसंघ चुनाव न होना छात्रों के बीच एक बड़ी खाई पैदा करता है, जहां उनकी समस्याओं को सुना नहीं जाता और उनकी ऊर्जा को सही दिशा नहीं मिल पाती।

छात्रसंघ चुनाव छात्रों को नेतृत्व के गुण सिखाते हैं, उन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से परिचित कराते हैं और उन्हें समाज के प्रति जवाबदेह बनाते हैं। यह आंदोलन दिखाता है कि युवा पीढ़ी अपने अधिकारों के प्रति कितनी जागरूक है और अपनी आवाज उठाने से पीछे नहीं हटेगी। दिल्ली में हो रहा यह प्रदर्शन सरकार और शिक्षा नीति निर्माताओं के लिए एक संकेत है कि विश्वविद्यालयों में छात्रों की लोकतांत्रिक भागीदारी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसका समाधान न केवल जामिया के छात्रों के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह देश के अन्य विश्वविद्यालयों के लिए भी एक मिसाल कायम करेगा।

Image Source: news.google.com

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