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तमिलनाडु सरकार: मुख्यमंत्री विजय के ‘आस्थावान ज्योतिषी’ की 24 घंटे में छीनी गई सरकारी कुर्सी, मचा सियासी बवाल!

दक्षिण की राजनीति में अक्सर नाटकीय मोड़ आते रहते हैं, लेकिन तमिलनाडु में मुख्यमंत्री विजय के कार्यकाल की शुरुआत जिस तरह हुई है, उसने सबको चौंका दिया है। एक तरफ जहां नई सरकार से उम्मीदें थीं, वहीं मुख्यमंत्री के एक खास ‘ज्योतिषी’ को सरकारी पद पर बिठाने और फिर 24 घंटे के भीतर उस फैसले को वापस लेने ने पूरे राज्य में सियासी तूफान खड़ा कर दिया है। यह सिर्फ एक नियुक्ति का मामला नहीं, बल्कि आस्था, विज्ञान और सत्ता के गलियारों में छिड़ी बहस का प्रतीक बन गया है।

मामला यह है कि मुख्यमंत्री विजय ने शपथ लेते ही अपने ‘आस्थावान ज्योतिषी’ रिक्की राधन पंडित को एक महत्वपूर्ण सरकारी पद पर नियुक्त किया। लेकिन इस फैसले पर न सिर्फ विपक्षी दलों ने कड़ी आपत्ति जताई, बल्कि आम जनता के बीच भी तीखी बहस छिड़ गई। नतीजा यह हुआ कि जिस पद पर पंडित जी को बिठाया गया था, वह कुर्सी 24 घंटे के अंदर ही उनसे वापस ले ली गई।

ज्योतिषी की नियुक्ति और तत्काल वापसी का पूरा घटनाक्रम

12 मई, 2026 को तमिलनाडु की मुख्य सचिव रीटा हरीश ठाकर ने एक सरकारी आदेश जारी किया। इस आदेश में रिक्की राधन पंडित वेट्रिवेल को मुख्यमंत्री के राजनीतिक प्रभाग के विशेष अधिकारी के रूप में नियुक्त करने की घोषणा की गई थी। यह खबर तमिलनाडु की राजनीति में आग की तरह फैल गई।

त.वे.क. (तमिलनाडु वेट्रिवेल कझगम) को बाहर से समर्थन दे रही मार्क्सवादी पार्टी ने तुरंत इस फैसले पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि एक ज्योतिषी को सरकारी अधिकारी बनाना ‘वैज्ञानिक सोच के खिलाफ’ है और इससे लोगों में अंधविश्वास बढ़ेगा। अगले ही दिन, विधानसभा में विश्वास मत के बाद, द्रमुक, विसीक और देमुदक सहित कई अन्य दलों ने भी इस नियुक्ति का कड़ा विरोध किया।

विपक्षी दलों के बढ़ते दबाव और जनविरोध के चलते, उसी दिन दोपहर में सरकार को अपना फैसला वापस लेना पड़ा। मुख्यमंत्री कार्यालय ने रिक्की राधन पंडित की नियुक्ति संबंधी सरकारी आदेश को रद्द करने की घोषणा की। विडंबना यह रही कि जब पंडित जी को अपनी कुर्सी जाने की खबर भी नहीं थी, वे अगले दिन सुबह मुख्यमंत्री से बधाई लेने के लिए गुलदस्ता लेकर सचिवालय पहुंचे थे। लेकिन उन्हें खाली हाथ वापस लौटा दिया गया।

मुख्यमंत्री और ज्योतिष पर गहरा विश्वास

मुख्यमंत्री विजय के करीबी सूत्रों की मानें तो उन्हें ज्योतिष पर गहरा विश्वास है। वे कोई भी बड़ा फैसला ज्योतिषी से सलाह लिए बिना नहीं करते। बताया जाता है कि रिक्की राधन पंडित ने ही पार्टी के गठन और उसके पहले सम्मेलन की तारीखें तय की थीं, यहां तक कि पार्टी का झंडा भी उन्हीं के बताए अनुसार डिजाइन किया गया था।

सूत्रों के अनुसार, पंडित लगातार मुख्यमंत्री पर सरकारी पद देने का दबाव बना रहे थे। अधिकारियों की सलाह पर उन्हें यह पद दिया गया था, लेकिन बढ़ते विरोध को देखते हुए मुख्यमंत्री ने खुद ही पद छीनने का फैसला किया।

कौन हैं रिक्की राधन पंडित? एक विवादित अतीत

रिक्की राधन पंडित का असली नाम वेट्रिवेल है और वे तिरुपुर जिले के ऊथुकुली से ताल्लुक रखते हैं। एक साधारण ज्योतिषी के रूप में शुरुआत करने वाले वेट्रिवेल की किस्मत तब चमकी जब वे अन्नाद्रमुक के एक पूर्व मंत्री के जरिए पोएस गार्डन (जयललिता का निवास) पहुंचे। 2001 के चुनावों में उनके बताए 10 से अधिक उम्मीदवारों को अन्नाद्रमुक ने टिकट दिया था, जिससे पार्टी में उनका प्रभाव बढ़ गया था।

उनका अतीत विवादों से भरा रहा है। बताया जाता है कि उन्होंने अन्नाद्रमुक के उत्तराधिकारी के बारे में भविष्यवाणी की थी कि ‘एक बाहरी महिला ही अन्नाद्रमुक को चलाएगी’। इसके बाद 2007 में शशिकला के एक रिश्तेदार ने उन्हें कथित तौर पर अगवा कर मारपीट की थी। उनकी पहली पत्नी आनंदी की कथित आत्महत्या का मामला भी दर्ज हुआ था, जिसके बाद उन्होंने आनंदी की बहन राजलक्ष्मी से दूसरी शादी की। इसके अलावा, उन्होंने सुभश्री नाम की तीसरी महिला से भी शादी की है।

एक बार उनके घर पर आयकर विभाग की छापेमारी भी हुई थी, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर शशिकला से जुड़े दस्तावेज आयकर विभाग को सौंप दिए थे। इससे शशिकला खेमा उनसे बेहद नाराज हो गया था। तमिलनाडु से दिल्ली जाकर उन्होंने आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और शरद पवार जैसे नेताओं के साथ नए संबंध बनाए। बाद में वे सिंगापुर चले गए और दिल्ली व तमिलनाडु आते-जाते रहे। इसी दौरान वे मुख्यमंत्री विजय के एक दोस्त के जरिए उनसे मिले और उनके ‘आस्थावान ज्योतिषी’ बन गए।

मायने और प्रभाव: एक राजनीतिक संदेश

तमिलनाडु सरकार द्वारा एक ज्योतिषी की नियुक्ति और फिर उसे इतनी जल्दी वापस लेना, कई गंभीर सवाल खड़े करता है और इसके गहरे राजनीतिक मायने हैं। यह घटना दर्शाती है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्यक्तिगत आस्था और सार्वजनिक पद की गरिमा के बीच एक स्पष्ट रेखा खींचना कितना महत्वपूर्ण है।

  • लोकतांत्रिक मूल्यों की जीत: यह दिखाता है कि जनता और विपक्षी दलों का दबाव कितना शक्तिशाली हो सकता है। सरकार को जनभावनाओं और संवैधानिक सिद्धांतों के खिलाफ जाने पर अपने फैसले बदलने पड़ते हैं।
  • वैज्ञानिक सोच बनाम अंधविश्वास: इस घटना ने सार्वजनिक जीवन में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने की बहस को फिर से जिंदा कर दिया है। सरकार से उम्मीद की जाती है कि वह तर्क और संविधान के दायरे में रहकर काम करे, न कि व्यक्तिगत आस्थाओं के आधार पर।
  • मुख्यमंत्री की छवि पर असर: मुख्यमंत्री विजय के लिए यह एक शुरुआती झटका है। उनकी सरकार को यह संदेश देना होगा कि वह प्रशासन को गंभीरता से ले रही है और भविष्य में ऐसे विवादों से बचेगी।
  • नैतिकता और पारदर्शिता: सरकारी नियुक्तियों में पारदर्शिता और नैतिकता बनाए रखना बेहद जरूरी है। किसी व्यक्ति के निजी संबंधों या व्यक्तिगत आस्था के आधार पर सरकारी पद देना स्वीकार्य नहीं हो सकता।
  • ज्योतिषी के लिए विडंबना: जिसने इतने बड़े-बड़े लोगों के भविष्य बताए, वह खुद अपनी कुर्सी का भविष्य नहीं देख पाया। यह घटना ज्योतिष की सीमाओं और मानव जीवन की अनिश्चितता को भी रेखांकित करती है।

कुल मिलाकर, यह घटना तमिलनाडु की राजनीति में एक महत्वपूर्ण सबक के रूप में दर्ज हो गई है। यह बताती है कि सत्ता में आने के बाद भी, हर कदम पर जनता की नजर रहती है और लोकतंत्र में जनहित ही सर्वोपरि होता है।

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