दिल्ली इन दिनों एक अजीब पहेली से जूझ रही है। आसमान में घने काले बादल मंडराते हैं, हवा में नमी और उमस बढ़ती है, लेकिन झमाझम बारिश की फुहारें गायब हैं। लोग छाते लेकर इंडिया गेट पर घूम रहे हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल धूप से बचने के लिए हो रहा है, बारिश से नहीं। हर साल 15 जून तक दिल्ली में दस्तक देने वाला मॉनसून इस बार कहीं अटक सा गया है। आखिर क्या है दिल्ली के इस ‘ड्राई स्पेल’ की असली कहानी, और यह क्यों परेशान कर रहा है पूरे एनसीआर को?
भारतीय मॉनसून सिर्फ बादलों और बारिश का खेल नहीं, बल्कि यह हवा, समुद्र और वातावरण के जटिल रिश्तों का नतीजा है। इस बार दिल्ली के मौसम की यह अनिश्चितता कई बड़े वैश्विक और स्थानीय कारकों का परिणाम है, जिन्हें समझना बेहद ज़रूरी है।
अल-नीनो: मॉनसून का सबसे बड़ा दुश्मन?
प्रशांत महासागर में इस समय एक शक्तिशाली अल-नीनो बन रहा है, जिसे वैज्ञानिक जुलाई-सितंबर 2026 में और मज़बूत होने का अनुमान लगा रहे हैं। अल-नीनो तब होता है जब प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का पानी सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस या उससे ज़्यादा गर्म हो जाता है। इसका सीधा असर भारत के मॉनसून पर पड़ता है।
सामान्य स्थिति में ‘ट्रेड विंड्स’ नामक हवाएं पूर्व से पश्चिम की ओर चलती हैं और नमी से भरे बादलों को भारत की ओर लाती हैं। लेकिन अल-नीनो के दौरान ये हवाएं कमज़ोर पड़ जाती हैं या अपना रुख बदल लेती हैं, जिससे भारतीय मॉनसून की शक्ति घट जाती है। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि अल-नीनो वाले वर्षों में भारत में औसत से कम बारिश होती है, और दिल्ली जैसे उत्तरी क्षेत्रों में इसका प्रभाव ज़्यादा दिखता है।
समुद्र का मिजाज और हवाओं का खेल
मॉनसून की अधिकांश नमी अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से आती है। इस समय इन समुद्री क्षेत्रों में सतह का तापमान अपेक्षाकृत कम या अनियमित है। जब समुद्र गर्म होता है, तो ज़्यादा वाष्पीकरण होता है और नमी बढ़ती है। अल-नीनो के साथ-साथ ‘इंडियन ओशन डाइपोल’ (IOD) की नकारात्मक या तटस्थ स्थिति भी नमी के प्रवाह को कम कर रही है।
दिल्ली में बादल इसलिए दिख रहे हैं क्योंकि निचले स्तर पर कुछ नमी तो पहुँच रही है, लेकिन ऊपरी वायुमंडल में सूखी हवाएं या उच्च दबाव प्रणाली घने बादलों को बारिश में बदलने से रोक रही है। इसे वैज्ञानिक ‘ड्राई स्पेल’ या ‘ब्रेक मॉनसून’ कहते हैं, जहाँ बादल तो होते हैं, पर बारिश नहीं होती।
जेट स्ट्रीम और पश्चिमी विक्षोभ की बदलती चाल
दिल्ली जैसे उत्तरी क्षेत्रों में मॉनसून पर पश्चिमी विक्षोभ का भी असर होता है। ये मध्य एशिया से आने वाली ठंडी और नम हवा की प्रणालियां हैं। इस बार ‘जेट स्ट्रीम’ (ऊपरी वायुमंडल में तेज़ हवाओं की पट्टी) की स्थिति सामान्य से अलग है। अल-नीनो के कारण जेट स्ट्रीम उत्तर की ओर खिसक गई है, जिससे पश्चिमी विक्षोभ दिल्ली तक कम पहुँच पा रहे हैं।
इसका नतीजा यह है कि दिन में तेज़ धूप, गर्मी और उमस बढ़ रही है। रात में बादलों के कारण गर्मी बाहर नहीं निकल पाती, जिससे न्यूनतम तापमान भी ऊँचा बना हुआ है। ‘क्लाउड कवर विदाउट रेन’ की यह स्थिति दिल्लीवासियों को बेहद परेशान कर रही है।
जलवायु परिवर्तन और शहरीकरण का गहरा असर
वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन मॉनसून को अनियमित बना रहा है। ग्लोबल वार्मिंग से समुद्र गर्म हो रहे हैं, लेकिन क्षेत्रीय पैटर्न बदल रहे हैं। IPCC की रिपोर्टें बताती हैं कि गर्म वातावरण ज़्यादा नमी रख सकता है, लेकिन इसका वितरण असमान हो गया है। इसका मतलब है कि कुछ दिनों में भारी बारिश और कुछ में लंबा सूखा दोनों देखने को मिल रहे हैं।
दिल्ली-एनसीआर में बढ़ता शहरीकरण भी इस समस्या को बढ़ा रहा है। कंक्रीट और इमारतें ज़्यादा गर्मी सोखती हैं, जिससे स्थानीय ‘लैंड-सी ब्रीज़’ प्रभावित होती है। इससे स्थानीय स्तर पर बारिश के बादल बनने में देरी होती है, और स्थिति और बिगड़ जाती है।
मायने और प्रभाव
किसानों की चिंता, शहरियों की परेशानी
दिल्ली के आसपास के इलाकों में खेती करने वाले किसान इस मॉनसून की बेरुखी से सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं। धान जैसी फसलों की देरी से रोपाई हो रही है, खेत सूख रहे हैं, और अगर बारिश नहीं हुई तो फसलों को भारी नुकसान हो सकता है। शहर में पानी की मांग बढ़ रही है, और एसी-कूलर ज़्यादा चलने से बिजली की खपत भी आसमान छू रही है, जिससे जेब पर अतिरिक्त भार पड़ रहा है।
स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर सीधा वार
उमस भरी गर्मी और लगातार बढ़ते तापमान से स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ रहा है। सांस की बीमारियां, डिहाइड्रेशन, और वायरल संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं। यह सिर्फ एक मौसम की घटना नहीं, बल्कि एक बड़े जलवायु परिवर्तन का संकेत है, जिसका सीधा असर हमारी अर्थव्यवस्था और जनजीवन पर पड़ रहा है।
आगे क्या?
भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने अल-नीनो को देखते हुए इस साल सामान्य से थोड़ी कम बारिश का अनुमान लगाया था। दिल्ली जैसे क्षेत्रों में ‘एक्टिव ब्रेक साइकल’ चल रहा है, जहाँ कभी-कभी अच्छी बारिश हो जाती है, फिर लंबा ब्रेक। वैज्ञानिक मॉडल इस प्रवृत्ति की पुष्टि कर रहे हैं। अगले कुछ हफ्तों में यदि IOD सकारात्मक हो जाता है या कोई मज़बूत पश्चिमी विक्षोभ आता है, तो स्थिति सुधर सकती है। लेकिन अल-नीनो के मज़बूत होने के कारण पूरे जुलाई और अगस्त में अनिश्चितता बनी रहेगी। हमें इस बदलते मौसम के साथ तालमेल बिठाना और समझदारी से तैयार रहना होगा।
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