मथुरा में ‘धोखे’ की मक्का: सरकारी बीज ने उजाड़ी किसानों की उम्मीदें, खाली भुट्टों ने रुलाया
उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में किसानों को उस वक्त गहरा सदमा लगा, जब उनकी लहलहाती मक्का की फसल में भुट्टे तो निकले, लेकिन उनमें दाने नदारद थे। यह सिर्फ फसल का नुकसान नहीं, बल्कि अन्नदाता के साथ हुई एक बड़ी धोखाधड़ी है, जिसने उनकी सालों की मेहनत और उम्मीदों पर पानी फेर दिया। खेतों में खड़ी फसल की यह हालत देखकर किसान रो पड़े हैं और उनका गुस्सा सातवें आसमान पर है।
सरकारी बीज भंडार से मिला ‘धोखा’
मामला मथुरा के बलदेव क्षेत्र का है, जहां किसानों ने खरीफ की बुवाई के लिए सरकारी बीज भंडार से मक्का के बीज खरीदे थे। उन्होंने पूरी उम्मीद और मेहनत से अपनी फसल लगाई, सिंचाई की, खाद डाली। जैसे-जैसे फसल बड़ी हुई और भुट्टे निकलने लगे, किसानों को लगा कि उनकी मेहनत रंग लाई है।
लेकिन, जब इन भुट्टों को खोला गया तो उनके होश उड़ गए। अंदर दाने की जगह सिर्फ खाली डंठल था। एक-दो नहीं, बल्कि पूरे के पूरे खेत में यही स्थिति थी। यह किसी बुरे सपने से कम नहीं, जहां फसल तैयार दिख रही है, लेकिन असल में पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है।
प्रति बीघा ₹25,000 का नुकसान, किसान बेहाल
किसानों का दावा है कि इस ‘दिखावे’ की फसल से उन्हें प्रति बीघा करीब 25 हजार रुपये तक का बड़ा नुकसान हुआ है। इसमें बीज की कीमत, बुवाई का खर्च, सिंचाई, खाद और मजदूरी सब शामिल है। छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह रकम बहुत बड़ी है, जो अक्सर कर्ज लेकर खेती करते हैं। खाली भुट्टों ने उनकी आजीविका पर सीधा वार किया है।
बलदेव क्षेत्र के इन किसानों ने अब प्रशासन से कड़ी कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि सरकारी बीज भंडार से मिले बीज की गुणवत्ता में इतनी बड़ी लापरवाही आखिर कैसे हो सकती है? यह सीधे तौर पर किसानों के साथ किया गया विश्वासघात है, जिसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए।
मायने और प्रभाव
यह घटना सिर्फ मथुरा के कुछ किसानों के नुकसान तक सीमित नहीं है, इसके गहरे और दूरगामी मायने हैं:
- आर्थिक संकट: किसानों की पूरी मेहनत बर्बाद होने से वे गहरे आर्थिक संकट में फंस गए हैं। कर्ज लेकर खेती करने वाले किसान अब उसे चुकाने के लिए और कर्ज लेने को मजबूर हो सकते हैं, जिससे वे गरीबी के दुष्चक्र में फंस सकते हैं।
- सरकारी व्यवस्था पर सवाल: सरकारी बीज भंडार का मकसद किसानों को अच्छी गुणवत्ता वाले बीज मुहैया कराना होता है। ऐसे में खराब बीज मिलने से सरकारी कृषि योजनाओं और वितरण प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। यह किसानों के भरोसे को तोड़ता है।
- खाद्य सुरक्षा पर असर: भले ही यह एक स्थानीय घटना हो, लेकिन ऐसी घटनाएं जब बड़े पैमाने पर होती हैं, तो वे देश की समग्र खाद्य सुरक्षा पर भी असर डाल सकती हैं। किसानों का मनोबल टूटने से वे अगली बार फसल लगाने में हिचकिचा सकते हैं।
- जांच और जवाबदेही की जरूरत: इस मामले की निष्पक्ष और त्वरित जांच होनी चाहिए। दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो और किसानों को हुए नुकसान की भरपाई की जाए। यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि भविष्य में ऐसी धोखाधड़ी दोबारा न हो।
- विश्वास का संकट: यह घटना किसानों और सरकार के बीच भरोसे के रिश्ते को कमजोर करती है। किसानों को लगता है कि उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है, जिससे कृषि क्षेत्र में निराशा बढ़ सकती है।
मथुरा की यह घटना एक चेतावनी है कि बीज की गुणवत्ता पर सख्त निगरानी और जवाबदेही बेहद जरूरी है, ताकि अन्नदाताओं को ऐसे धोखे का शिकार न होना पड़े और वे आत्मनिर्भर भारत की नींव मजबूत कर सकें।
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