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मायावती का ‘बूथ बचाओ’ अभियान: क्या ज़मीनी तैयारी से यूपी की सियासत में वापस लौटेगी बसपा?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अपनी खोई हुई ज़मीन तलाशती दिख रही है। हाल ही में लखनऊ में अपनी ताक़त का अहसास कराने के बाद, पार्टी सुप्रीमो मायावती ने अब सीधे ज़मीन पर उतरकर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने का बीड़ा उठाया है। यह सिर्फ़ एक रणनीति नहीं, बल्कि बसपा के लिए अस्तित्व की लड़ाई है, जिसका केंद्र अब बूथ और सेक्टर बन चुके हैं।

कभी यूपी की सियासत की धुरी रही बसपा, पिछले कुछ चुनावों में हाशिए पर जाती दिखी है। लेकिन, अब पार्टी ने 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए कमर कस ली है और उसकी तैयारी इस बार ज़मीनी स्तर से शुरू हुई है, जिसमें ‘बूथ’ को सबसे मज़बूत कड़ी बनाने पर जोर दिया जा रहा है।

लखनऊ से गांव-गांव तक, बसपा की नई रणभेरी

मायावती ने भले ही लखनऊ में एक बड़े कार्यक्रम के ज़रिए अपने समर्थकों को एकजुटता का संदेश दिया हो, लेकिन असली लड़ाई अब गांवों और मोहल्लों में लड़ी जा रही है। पार्टी का मानना है कि सत्ता का रास्ता बूथ से होकर गुज़रता है और इसी मंत्र के साथ कार्यकर्ता पूरे प्रदेश में सक्रिय हो गए हैं।

गोरखपुर में बसपा ने अपनी चुनावी तैयारियों को तेज़ कर दिया है। यहां बूथ स्तर पर संगठन को मज़बूत करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इसी कड़ी में 24 अक्टूबर को एक बार फिर मतदाता अभियान चलाया जाएगा, जिसका मक़सद हर वोटर तक सीधी पहुंच बनाना है।

केवल गोरखपुर ही नहीं, महाराजगंज और मुरादाबाद जैसे ज़िलों में भी बसपा की बूथ व सेक्टर स्तरीय बैठकें लगातार आयोजित हो रही हैं। इन बैठकों में कार्यकर्ताओं को आगामी चुनावों के लिए तैयार किया जा रहा है और उन्हें घर-घर जाकर पार्टी की नीतियों और मायावती के संदेश को पहुंचाने का काम सौंपा जा रहा है।

बूथ और सेक्टर पर क्यों है बसपा का पूरा ज़ोर?

बसपा की रणनीति में यह बदलाव उसके पुराने दिनों की याद दिलाता है, जब पार्टी ‘एक बूथ, दस यूथ’ के नारे के साथ ज़मीनी स्तर पर अजेय मानी जाती थी। पिछले कुछ चुनावों में बसपा का पारंपरिक दलित वोट बैंक खिसकता दिखा है, और पार्टी को एहसास है कि बिना सीधे संपर्क के इसे वापस लाना मुश्किल होगा।

बूथ और सेक्टर की मज़बूती से पार्टी न सिर्फ़ अपने कोर वोट बैंक को फिर से एकजुट कर पाएगी, बल्कि नए मतदाताओं को भी अपनी ओर खींचने की कोशिश करेगी। यह रणनीति मतदाताओं को साधने और चुनावी दिन मतदान प्रतिशत बढ़ाने में निर्णायक साबित हो सकती है।

मायावती का ‘साइलेंट दांव’: 2027 की बिसात

यह कहना ग़लत नहीं होगा कि मायावती इस बार ‘साइलेंट दांव’ चल रही हैं। बड़े-बड़े रोड शो और रैलियों की बजाय, उनका ध्यान छोटे-छोटे कैडर कैंपों और ज़मीनी बैठकों पर है। यह रणनीति उन्हें बिना ज़्यादा शोर-शराबे के अपने संगठन को अंदरूनी तौर पर मज़बूत करने का मौक़ा दे रही है।

पार्टी नेतृत्व का मानना है कि 2027 के विधानसभा चुनाव अभी दूर लग सकते हैं, लेकिन तैयारी अभी से शुरू करना बेहद ज़रूरी है। बसपा इस बार किसी भी चूक की गुंजाइश नहीं छोड़ना चाहती और इसी वजह से बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं को ‘चार्ज’ किया जा रहा है।

मायने और प्रभाव

बसपा की यह ज़मीनी सक्रियता उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिए कई मायने रखती है। अगर बसपा अपने पुराने अंदाज़ में बूथ स्तर पर मज़बूत हो पाती है, तो यह न सिर्फ़ समाजवादी पार्टी (सपा) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए नई चुनौती खड़ी करेगा, बल्कि राज्य के राजनीतिक समीकरणों को भी बदल सकता है।

आम जनता के लिए इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में उन्हें राजनीतिक दलों का सीधा जुड़ाव देखने को मिल सकता है। बसपा की यह कोशिश दलित और अति पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं को एक बार फिर अपनी ओर खींचने की है, जो कभी उसके मज़बूत स्तंभ थे। अगर यह दांव सफल होता है, तो यूपी की सियासत में एक बार फिर त्रिकोणीय या बहुकोणीय मुक़ाबले की उम्मीद बढ़ जाएगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि मायावती की यह ‘बूथ बचाओ’ रणनीति 2027 में बसपा को सत्ता के गलियारों तक वापस पहुंचा पाती है या नहीं।

Image Source: news.google.com

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