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मुंबई में ‘ठाकरे गर्जना’: EC के फैसले पर क्यों एक हुए उद्धव और राज?

मुंबई में ‘ठाकरे गर्जना’: EC के फैसले पर क्यों एक हुए उद्धव और राज?

मुंबई की सड़कों पर हाल ही में एक ऐसा सियासी नजारा देखने को मिला, जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी। महाराष्ट्र की राजनीति में दशकों से प्रतिद्वंद्वी रहे ठाकरे परिवार के दो दिग्गज, उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे, एक साझा मंच पर खड़े नजर आए। मौका था चुनाव आयोग के एक फैसले के खिलाफ जोरदार विरोध प्रदर्शन का, जिसने पूरे राज्य का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।

ठाकरे बंधुओं की ऐतिहासिक एकजुटता

यह ‘गरजना मार्च’ चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाने के लिए आयोजित किया गया था। उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) और राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) ने मिलकर इस विरोध प्रदर्शन में अपनी ताकत दिखाई। मुंबई की सड़कों पर दोनों भाइयों के समर्थकों का हुजूम उमड़ पड़ा, जो चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवाल उठा रहा था।

राज ठाकरे के तीखे बोल: ‘वोट चोरी’ का आरोप

मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने इस मौके पर बेहद तीखे बयान दिए। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने पहले भी कांग्रेस नेता सोनिया गांधी से कहा था कि वोटों की चोरी हो रही है और चुनाव का बहिष्कार करना चाहिए। राज ठाकरे ने एक बार फिर चुनाव प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और ईवीएम को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त कीं, जिससे यह मुद्दा और गरमा गया है।

भाजपा का पलटवार: ‘गजनी’ और ‘लोमड़ी’ के ताने

ठाकरे बंधुओं के इस एकजुट विरोध प्रदर्शन पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने तुरंत पलटवार किया। महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने राज ठाकरे को ‘गजनी’ कहकर उनकी कथित भूलने की बीमारी पर तंज कसा। वहीं, भाजपा नेता आशीष शेलार ने उन्हें ‘लोमड़ी’ बताते हुए उनके इस कदम को सियासी मौकापरस्ती करार दिया।

सियासी हलचल और अन्य दलों का रुख

इस विरोध मार्च को सिर्फ ठाकरे बंधुओं का ही समर्थन नहीं मिला। शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी-शरदचंद्र पवार गुट) ने भी इस आंदोलन को अपना साथ दिया। हालांकि, चुनाव बहिष्कार के मुद्दे पर मनसे और कांग्रेस के बीच मतभेद भी सामने आए। कुछ कांग्रेसी नेताओं ने राज ठाकरे की बातों से सहमति जताई, जबकि पार्टी का आधिकारिक रुख इससे अलग रहा।

मायने और प्रभाव: महाराष्ट्र की राजनीति पर असर

उद्धव और राज ठाकरे का एक साथ आना महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ी घटना है। यह न सिर्फ ठाकरे परिवार की पुरानी प्रतिद्वंद्विता को भुलाकर एक नई राजनीतिक समीकरण की ओर इशारा करता है, बल्कि आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनावों पर भी इसका गहरा असर पड़ सकता है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठना और ‘वोट चोरी’ जैसे गंभीर आरोप लगना, आम जनता में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर भरोसे को कमजोर कर सकता है।

यह विरोध प्रदर्शन दिखाता है कि विपक्षी दल चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर कितने गंभीर हैं। भाजपा के तीखे जवाब बताते हैं कि वे इस एकजुटता को हल्के में नहीं ले रहे हैं। मुंबई की सड़कों पर उतरा यह जनसैलाब आने वाले समय में महाराष्ट्र की सियासी हवा का रुख तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि यह ‘गरजना’ कितनी दूर तक गूंजती है और इसका अंतिम परिणाम क्या होता है।

Image Source: news.google.com

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