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विराट कोह्ली और रोहित शर्मा के मैदान से दूर रहने का असर: BCCI को करोड़ों का नुकसान, आखिर क्यों नहीं मिल रहे स्पॉन्सर?

दुनिया के सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड, भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) को इन दिनों एक अजीबोगरीब चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। टीम इंडिया के लिए टाइटल स्पॉन्सर ढूंढना मुश्किल हो गया है, जबकि बोर्ड ने प्रति मैच की न्यूनतम बोली बढ़ा दी है। चौंकाने वाली बात यह है कि इसकी एक बड़ी वजह विराट कोह्ली और रोहित शर्मा जैसे दिग्गज खिलाड़ियों का कुछ टेस्ट और टी-20 मैचों से दूर रहना बताया जा रहा है।

क्रिकेट जगत में अपनी मजबूत वित्तीय स्थिति के लिए मशहूर बीसीसीआई को उम्मीद थी कि इस बार टाइटल स्पॉन्सरशिप के लिए कंपनियों की भीड़ उमड़ेगी, लेकिन हुआ इसके ठीक उलट। बोर्ड ने अगले दो सालों के लिए प्रति मैच 4.85 करोड़ रुपये की न्यूनतम कीमत तय की थी, जो पिछली डील से काफी ज्यादा है। पिछली बार आईडीएफसी फर्स्ट बैंक प्रति मैच 4.2 करोड़ रुपये दे रहा था।

आखिर क्यों नहीं मिल रहे स्पॉन्सर?

विश्लेषकों और खेल जगत से जुड़े लोगों का मानना है कि स्पॉन्सरशिप के लिए कंपनियों की बेरुखी का मुख्य कारण भारतीय क्रिकेट के दो सबसे बड़े चेहरे, विराट कोह्ली और रोहित शर्मा का टेस्ट और टी-20 फॉर्मेट से कुछ समय के लिए दूरी बनाना है। इन खिलाड़ियों की गैर-मौजूदगी से मैचों की ब्रांड वैल्यू और दर्शकों की रुचि पर असर पड़ने की आशंका है, जिससे स्पॉन्सर इतने बड़े निवेश से कतरा रहे हैं।

विराट कोह्ली और रोहित शर्मा न सिर्फ बेहतरीन खिलाड़ी हैं, बल्कि वे ग्लोबल आइकन भी हैं जिनकी फैन फॉलोइंग करोड़ों में है। उनके नाम से ही मैच देखने वालों की संख्या और विज्ञापनों की पहुंच कई गुना बढ़ जाती है। ऐसे में, जब ये सितारे मैदान पर नहीं होते, तो कंपनियों को लगता है कि उनका निवेश उतना प्रभावी नहीं रहेगा।

बीसीसीआई की मुश्किलें और आगे की राह

बीसीसीआई ने 20 जुलाई को टाइटल स्पॉन्सरशिप के लिए टेंडर जारी किया था। टेंडर जमा करने की आखिरी तारीख 13 अगस्त थी, लेकिन बोर्ड को एक भी बोली नहीं मिली। इस अभूतपूर्व स्थिति के बाद बीसीसीआई को बोली की समय सीमा बढ़ानी पड़ी है।

अब खबरें आ रही हैं कि बीसीसीआई ने गूगल जेमिनी, स्पिननी और एसबीआई लाइफ जैसी प्रमुख कंपनियों के साथ बातचीत शुरू कर दी है। इसके अलावा, बोर्ड ने एसोसिएट पार्टनर अधिकारों के लिए भी ‘रिक्वेस्ट फॉर कोटेशन’ (RFQ) जारी किया है। टाइटल स्पॉन्सर तय होने के बाद ही एसोसिएट पार्टनरशिप पर मुहर लगेगी। यह सब दर्शाता है कि बीसीसीआई इस वित्तीय वर्ष में एक बड़ी चुनौती का सामना कर रहा है।

मायने और प्रभाव

यह खबर सिर्फ बीसीसीआई के लिए नहीं, बल्कि भारतीय क्रिकेट और उसके करोड़ों प्रशंसकों के लिए भी महत्वपूर्ण है। अगर दुनिया का सबसे धनी क्रिकेट बोर्ड भी स्पॉन्सरशिप के लिए जूझ रहा है, तो यह क्रिकेट की बदलती तस्वीर को दिखाता है। यह साफ संकेत देता है कि स्टार खिलाड़ियों की मौजूदगी किसी भी खेल आयोजन की ब्रांड वैल्यू के लिए कितनी अहम है।

अगर बीसीसीआई को उम्मीद के मुताबिक स्पॉन्सर नहीं मिलते, तो इसका असर टीम के विकास, बुनियादी ढांचे और आने वाले टूर्नामेंटों की तैयारी पर पड़ सकता है। यह घटनाक्रम भविष्य में खिलाड़ियों की उपलब्धता और उनके विभिन्न फॉर्मेट में खेलने की रणनीति पर भी सवाल उठा सकता है। यह आम जनता को यह समझने में मदद करता है कि उनके पसंदीदा खिलाड़ियों का मैदान पर होना सिर्फ खेल के लिए ही नहीं, बल्कि खेल के अर्थशास्त्र के लिए भी कितना मायने रखता है।

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