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अरूप रॉय की बगावत से ममता की तृणमूल कांग्रेस का सियासी किला ढहा: क्या है बीजेपी की रणनीति?

पश्चिम बंगाल में सियासी भूचाल: कैसे बिखर गई ममता की तृणमूल कांग्रेस?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में जो हुआ, उसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी! लगातार 15 सालों तक सत्ता पर काबिज रहने वाली ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, चुनावी हार के कुछ ही हफ्तों में ताश के पत्तों की तरह बिखर गई है। यह सिर्फ एक राजनीतिक टूट नहीं, बल्कि एक युग के अंत की शुरुआत है, जिसने पूरे देश को चौंका दिया है।

4 मई 2026 को आए चुनावी नतीजों ने पश्चिम बंगाल में राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह से पलट दिया। जिस पार्टी की जड़ें इतनी गहरी मानी जाती थीं, वह अब तीन अलग-अलग धड़ों में बंट चुकी है। राजनीतिक गलियारों में इसे ‘भीतर से ढहना’ कहा जा रहा है।

एक तरफ, पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर जीते ज़्यादातर नए विधायक अरूप रॉय के नेतृत्व में एक अलग गुट बना चुके हैं। खुद को ‘असली तृणमूल’ कहने वाला यह धड़ा अब कोलकाता में सत्तारूढ़ बीजेपी के मुख्य विपक्षी दल की भूमिका निभा रहा है।

दूसरी तरफ, दिल्ली में कम-से-कम 20 लोकसभा सांसदों ने स्पीकर को पत्र लिखकर पुरानी पार्टी छोड़ने का ऐलान किया है। उन्होंने एक नई, अल्पज्ञात पार्टी NCPI में शामिल होकर केंद्र में बीजेपी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को समर्थन देने की बात कही है।

और इन सबसे अलग, ममता बनर्जी — जो कागज़ पर अब भी तृणमूल कांग्रेस की सर्वोच्च नेता हैं — अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के साथ मिलकर राजनीतिक अस्तित्व की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रही हैं। पश्चिम बंगाल मीडिया ने इस गुट को ‘कालीघाट तृणमूल’ नाम दिया है, जिसके साथ अब सिर्फ गिने-चुने नेता और प्रतिनिधि बचे हैं।

तृणमूल का संकट: सिर्फ़ चुनाव जीतने की होड़?

सवाल उठता है कि जो पार्टी कल तक राज्य पर इतनी मज़बूती से शासन कर रही थी, वह 28 साल पुरानी पार्टी सिर्फ 28 दिनों में टुकड़ों में कैसे बिखर गई? खासकर तब, जब उसकी कमान ममता बनर्जी जैसी ताकतवर, अनुभवी और लोकप्रिय नेता के हाथों में थी। वह इस टूट को रोकने में क्यों नाकाम रहीं?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस की राजनीति हमेशा से ‘चुनाव-केंद्रित’ रही। इसकी कोई स्पष्ट विचारधारा या दर्शन नहीं था, बल्कि यह सिर्फ लोकप्रियतावाद पर चलती रही। रेल मंत्री रहते हुए यात्री किराए न बढ़ाना या CPI(M) को सत्ता से हटाना ही इसके मुख्य लक्ष्य रहे।

लगातार चौथी चुनावी हार के बाद, कभी ममता बनर्जी के वफादार रहे नेताओं ने भी उनका साथ छोड़ दिया। यह साफ दिखाता है कि वे मानते थे कि चुनाव हारने के बाद पार्टी का कोई भविष्य नहीं बचता। ममता बनर्जी ने खुद भी लोकतांत्रिक फैसले को स्वीकार नहीं किया और अपनी हार को अदालत में चुनौती दी। उन्होंने यहां तक कहा, “मैं हारी नहीं हूँ, मुझे हराया गया है।”

भारत के राजनीतिक इतिहास में कई बड़ी पार्टियों ने हार के बाद भी अपनी विचारधारा और संगठनात्मक ढांचे के दम पर खुद को संभाला है, जैसे बीजेपी का हिंदुत्व या कांग्रेस की समाजवादी परंपराएं। लेकिन तृणमूल के नेताओं को चुनाव हारने के बाद लगा कि उनके पास कुछ भी नहीं बचा — न राजनीति जारी रखने का तरीका, न जनता से जुड़ाव बनाए रखने का कोई आधार।

‘माँ-माटी-मानुष’ के नारे पर बनी इस सरकार की नींव शायद जितनी मजबूत दिखती थी, उतनी थी नहीं। ‘सबुज साथी’, ‘कन्याश्री’ जैसी लोकप्रिय योजनाएं भी पार्टी को बिखरने से नहीं बचा पाईं। 41% वोट पाने के बावजूद इतनी तेज़ी से टूट जाना यही दर्शाता है कि पार्टी चुनाव-केंद्रित राजनीति से आगे नहीं बढ़ पाई।

बीजेपी की दोहरी रणनीति: कोलकाता से दिल्ली तक

इसमें कोई संदेह नहीं कि 4 मई की चुनावी हार ने ममता बनर्जी को उनके राजनीतिक करियर के सबसे नाजुक मोड़ पर ला खड़ा किया। बीजेपी ने इस मौके का पूरा फायदा उठाया और ‘कमजोर’ तृणमूल पर हमला करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

केंद्र और राज्य, दोनों जगह सत्ता में होने के नाते बीजेपी ने बखूबी समझा कि ममता बनर्जी को निशाना बनाने का यह सबसे सही समय है। तृणमूल को तोड़ना उसे कोलकाता और दिल्ली, दोनों जगह फायदा पहुंचाता।

बीजेपी ने कालीघाट तृणमूल से बगावत करने वाले कोलकाता के विधायकों और दिल्ली के सांसदों को सक्रिय समर्थन दिया। बागी विधायकों के नेता अरूप रॉय ने दिल्ली में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से ‘शिष्टाचार भेंट’ की, वहीं बागी सांसदों की बैठकें बीजेपी नेता भूपेंद्र यादव के आवास पर हुईं। दिल्ली में तो यह भी कहा जा रहा है कि गृह मंत्री अमित शाह ने परोक्ष रूप से इस पूरे अभियान की निगरानी की।

लेकिन बीजेपी ने कोलकाता और दिल्ली में अलग-अलग टूट की रणनीति क्यों अपनाई?

जवाब साफ है: बीजेपी जानती है कि ममता बनर्जी प्रशासक के बजाय विपक्षी नेता के रूप में कहीं ज़्यादा मज़बूत हैं। राज्य में पहली बार सत्ता हासिल करने के बाद बीजेपी स्वाभाविक रूप से चाहती थी कि विपक्ष का नियंत्रण ममता बनर्जी से निकलकर किसी ‘अनुकूल’ विपक्षी दल के हाथ में जाए। अरूप रॉय और संदीपन साहा जैसे नेताओं को आगे रखकर बीजेपी ने यही मकसद साधा।

दिल्ली में तृणमूल को तोड़ने का मकसद मोदी सरकार को और मज़बूत करना था। 2024 के आम चुनाव में बीजेपी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था, और उसकी सरकार सहयोगियों पर निर्भर थी। ऐसे में, तृणमूल के दो-तिहाई से ज़्यादा सांसदों को तोड़कर एक नया गुट बनाया गया, जिसने एनडीए का समर्थन किया। इससे लोकसभा में सरकार की ताकत 300 से ऊपर पहुँच गई। काकोली घोष दस्तीदार, सुदीप बनर्जी और शताब्दी रॉय जैसे सांसदों को आगे रखकर बीजेपी ने यह लक्ष्य हासिल किया।

दिलचस्प बात यह है कि बीजेपी ने न तो विधानसभा में और न ही संसद में इन बागियों को अपनी पार्टी में औपचारिक रूप से शामिल किया। कल्याण बनर्जी जैसे कुछ नेताओं का तर्क है कि बीजेपी इन ‘गद्दार’ और ‘लालची’ तत्वों को अपनी पार्टी में नहीं लेगी, क्योंकि वे खुद को पहले ही साबित कर चुके हैं।

अभिषेक बनर्जी फैक्टर: ‘कमांडर’ पर उठे सवाल

पिछले कुछ हफ़्तों में बगावत करने वाले लगभग हर तृणमूल नेता ने एक ही बात कही है: पार्टी के भीतर ‘दमघोंटू माहौल’ के लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी एक ही व्यक्ति की है – ममता बनर्जी के भतीजे और उनके अनौपचारिक राजनीतिक उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी की।

कई सालों तक उन्हें ‘युवराज’ और फिर ‘कमांडर’ कहा गया। लेकिन धीरे-धीरे संगठन की असली कमान उन्हीं के हाथों में आ गई। अभिषेक बनर्जी ने पार्टी को कॉर्पोरेट अंदाज़ में चलाया और अपने चारों ओर एक सीमित आंतरिक मंडली बना ली, जिससे ज़मीनी स्तर और शीर्ष नेतृत्व के बीच दूरी बढ़ती गई।

पूर्व तृणमूल नेता सुखेंदु शेखर रॉय ने कहा, “एक व्यक्ति था जो सबकी पहुँच से पूरी तरह बाहर था। उससे संवाद करना बिल्कुल असंभव था।” उनका निशाना साफ तौर पर अभिषेक बनर्जी पर था। पुराने नेताओं का तर्क है कि अभिषेक ने पार्टी के संगठनात्मक आधार को बदल दिया, जिससे भारी नुकसान हुआ। ममता की ताकत आम लोगों की नब्ज समझना थी, लेकिन अभिषेक के कॉर्पोरेट-स्टाइल अनुशासन ने पार्टी और जनता के बीच बड़ी खाई पैदा कर दी।

इसके अलावा, चुनावी परामर्श कंपनी आई-पैक को पार्टी की रणनीतिक निर्णय प्रक्रिया में शामिल करने से भी संगठन के भीतर तीखी नाराजगी पैदा हुई। नेताओं ने सार्वजनिक रूप से शिकायत की कि आई-पैक के वेतनभोगी पेशेवरों ने तृणमूल कांग्रेस को ‘हाइजैक’ कर लिया है। यह सब अभिषेक बनर्जी के मौन समर्थन और ममता बनर्जी की ‘अंधे स्नेह’ का नतीजा था।

अभिषेक बनर्जी पर भ्रष्टाचार और वित्तीय गड़बड़ियों के कई आरोप भी लगे हैं, जिन्होंने उनकी व्यक्तिगत छवि को नुकसान पहुँचाया है। हालाँकि ये मामले अभी जाँच के दायरे में हैं, लेकिन उनकी ऐसी छवि बन गई है कि बागी नेता उन पर उंगली उठाकर अपने पाला बदलने के फैसले को सही ठहराते हैं। इस तरह, तृणमूल कांग्रेस के इतनी तेज़ी से बिखर जाने के पीछे शायद सबसे बड़ा कारक खुद अभिषेक बनर्जी ही हैं।

मायने और प्रभाव (Impact & Analysis)

पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस का यह बिखराव सिर्फ एक पार्टी का संकट नहीं, बल्कि राज्य के राजनीतिक भविष्य के लिए एक बड़ा मोड़ है।

  • ममता बनर्जी और तृणमूल का भविष्य: ममता के लिए यह उनके राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी चुनौती है। क्या वह ‘कालीघाट तृणमूल’ को फिर से खड़ा कर पाएंगी या यह सिर्फ इतिहास का एक पन्ना बन कर रह जाएगी? उनकी लोकप्रियता और जुझारूपन पर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
  • बीजेपी का बढ़ता वर्चस्व: बीजेपी ने जिस तरह से तृणमूल की टूट का फायदा उठाया है, वह उसकी सियासी सूझबूझ को दर्शाता है। पश्चिम बंगाल में पहली बार सत्ता में आने के बाद, बीजेपी ने एक कमजोर और बिखरे हुए विपक्ष को सुनिश्चित किया है, जिससे उसे अपनी नीतियों को लागू करने में आसानी होगी। दिल्ली में भी सरकार को अतिरिक्त समर्थन मिलना एक बड़ी जीत है।
  • क्षेत्रीय राजनीति पर असर: तृणमूल का यह हश्र अन्य क्षेत्रीय दलों के लिए एक चेतावनी है, खासकर उन पार्टियों के लिए जो किसी एक व्यक्ति की करिश्माई छवि पर बहुत ज़्यादा निर्भर करती हैं। यह दिखाता है कि बिना मजबूत विचारधारा और संगठनात्मक ढांचे के, चुनावी हार के बाद अस्तित्व बनाए रखना कितना मुश्किल हो सकता है।
  • जनता के लिए निहितार्थ: एक मजबूत विपक्ष लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। तृणमूल के बिखराव से पश्चिम बंगाल में विपक्ष की आवाज़ कमजोर हो सकती है, जिससे सत्ताधारी दल की जवाबदेही कम होने का खतरा है। जनता को अब एक नए और प्रभावी विपक्षी नेतृत्व की तलाश होगी।
  • अरूप रॉय जैसे नेताओं का उदय: अरूप रॉय जैसे नेताओं का एक नए धड़े के रूप में सामने आना पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई संभावनाओं और समीकरणों को जन्म देगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि यह नया धड़ा कितना प्रभावी साबित होता है और क्या यह राज्य में एक वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति के रूप में उभर पाता है।

कुल मिलाकर, तृणमूल का यह बिखराव पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत है, जिसके दूरगामी परिणाम होंगे। यह देखना होगा कि ममता बनर्जी इस गहरे संकट से कैसे उबरती हैं और क्या पश्चिम बंगाल की जनता उन्हें एक बार फिर अपना ‘दीदी’ मानती है।

Image Source: www.bbc.com

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