HomeBlogचेन्नई में 'परंदूर हवाई अड्डा' रद्द: विकास या विनाश? विधानसभा से सड़क...

चेन्नई में ‘परंदूर हवाई अड्डा’ रद्द: विकास या विनाश? विधानसभा से सड़क तक गरमाई बहस!

तमिलनाडु की सियासत में इन दिनों एक बड़ा सवाल गरमाया हुआ है: क्या विकास की उड़ान पर पर्यावरण का ब्रेक लग गया है? चेन्नई के बहुप्रतीक्षित परंदूर हवाई अड्डा परियोजना को रद्द करने के मुख्यमंत्री के ऐलान ने राज्य में एक नई बहस छेड़ दी है, जहाँ उद्योग जगत से लेकर पर्यावरणविदों तक, हर कोई अपनी-अपनी दलीलें पेश कर रहा है। यह सिर्फ एक हवाई अड्डे का मामला नहीं, बल्कि राज्य के भविष्य की दिशा तय करने वाला एक अहम फैसला है।

क्या है परंदूर हवाई अड्डा परियोजना का पूरा मामला?

दरअसल, मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने सोमवार को विधानसभा में घोषणा की कि परंदूर हवाई अड्डा परियोजना को रद्द किया जा रहा है। उनका कहना था कि नया हवाई अड्डा ऐसी जगह बनाया जाना चाहिए, जहाँ किसानों और रिहायशी इलाकों को कोई नुकसान न पहुँचे। इसके बाद विभाग के विशेषज्ञों और शिक्षाविदों से सलाह लेकर कुछ वैकल्पिक जगहों की पहचान की गई है, जहाँ किसानों की ज़मीन या घरों को नुकसान न हो।

इन चिन्हित स्थानों पर तकनीकी व्यवहार्यता की जाँच की जा रही है, जिसके बाद नए हवाई अड्डे के लिए अंतिम जगह तय की जाएगी। मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि मीनांबक्कम हवाई अड्डे का विस्तार किया जा रहा है, और टर्मिनल 3 और 5 के पूरा होने के बाद यह सालाना 55 मिलियन यात्रियों को संभालने में सक्षम होगा।

विधानसभा में गरमाई बहस: पक्ष और विपक्ष की दलीलें

मुख्यमंत्री के इस ऐलान के बाद तमिलनाडु विधानसभा में डीएमके और त.वे.क. के बीच तीखी बहस देखने को मिली। डीएमके के पूर्व मंत्री थंगम थेन्नारसु ने मंगलवार को सदन में कहा कि परंदूर हवाई अड्डा परियोजना को रद्द करना तमिलनाडु के भविष्य के विकास और निवेश के अवसरों के लिए एक बड़ा झटका होगा।

हालांकि, उद्योग मंत्री कीर्थना ने स्पष्ट किया कि केवल ऐसी ज़मीनें ही अधिग्रहित की जाएँगी, जिनसे लोगों और कृषि भूमि को नुकसान न हो। कानून मंत्री सी.टी.आर. निर्मलकुमार ने बताया कि इस परियोजना के लिए 5,846 एकड़ ज़मीन की ज़रूरत थी, जिसमें से 3,774 एकड़ पट्टा भूमि थी और इसमें 2,681 एकड़ उपजाऊ कृषि भूमि भी शामिल थी।

थेन्नारसु ने दावा किया था कि 90% ज़मीन अधिग्रहित कर ली गई थी, लेकिन निर्मलकुमार ने इस बात का खंडन करते हुए कहा कि केवल 48% ज़मीन ही अधिग्रहित की गई थी और एकनापुरम, कराई, थंडलम जैसे गाँवों में तो एक इंच भी ज़मीन नहीं ली गई। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए ही परियोजना रद्द की गई है।

पर्यावरणविदों की जीत या विकास को झटका?

परंदूर हवाई अड्डा परियोजना के रद्द होने का पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने ज़ोरदार स्वागत किया है। जल विशेषज्ञ जनकराजान ने इसे चेन्नई को बाढ़ से बचाने वाला एक महत्वपूर्ण फैसला बताया। उन्होंने समझाया कि परंदूर का भौगोलिक ढाँचा ऐसा है कि यह जव्वाधू पर्वत से आने वाले पानी को पालागु अणैकट्टु और कावेरीपक्कम झील तक ले जाता है, जो सैकड़ों अन्य झीलों को पानी देती है।

अगर परंदूर को कंक्रीट के ढाँचे में बदल दिया जाता, तो कूवम नदी में बाढ़ का पानी चेन्नई के लिए बड़ी तबाही ला सकता था। जनकराजान का यह भी मानना है कि चेन्नई और उसके आसपास के ज़िलों में लगभग चार हज़ार से ज़्यादा झीलें हैं और किसी भी ज़िले में हवाई अड्डे के लिए जगह चुनने पर किसानों और जल निकायों को नुकसान होगा।

वहीं, उद्योग जगत ने इस फैसले पर चिंता जताई है। भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) के चेन्नई क्षेत्रीय समन्वयक शंकर का कहना है कि औद्योगिक विकास के लिए हवाई अड्डा बेहद ज़रूरी है। उन्होंने बताया कि चेन्नई के मीनांबक्कम हवाई अड्डे की यात्री क्षमता 2035 तक ही पर्याप्त होगी, और उसके बाद राज्य को एक दूसरे अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की सख़्त ज़रूरत होगी।

मीनांबक्कम और वैकल्पिक स्थलों पर विचार

थंगम थेन्नारसु ने बताया कि नए हवाई अड्डे के लिए विभिन्न चरणों में ज़मीन की बनावट, पर्यावरण, सुरक्षा, हवाई क्षेत्र प्रतिबंध और जनसंख्या घनत्व जैसे कई पहलुओं पर शोध किया गया था। चेन्नई के पूर्वी हिस्से में बंगाल की खाड़ी, उत्तरी में मनाली, एन्नूर, दक्षिणी में तांबरम वायु सेना का हवाई क्षेत्र, कल्पाक्कम परमाणु ऊर्जा संयंत्र और वेदांथंगल पक्षी अभयारण्य जैसी बाधाओं के कारण पश्चिमी हिस्से में पन्नूर और परंदूर जैसे स्थानों पर गहन विचार किया गया था।

शंकर ने हैदराबाद और बेंगलुरु जैसे शहरों का उदाहरण दिया, जिन्होंने हवाई अड्डों के कारण तेज़ी से विकास किया है। उनका तर्क है कि विदेशी कंपनियों के प्रतिनिधियों को सीधे चेन्नई आना चाहिए, न कि दिल्ली से होकर। उन्होंने मदुरै, तिरुचि और कोयंबटूर जैसे मौजूदा हवाई अड्डों के विस्तार का सुझाव दिया, लेकिन जनकराजान और अन्य विशेषज्ञों का मानना है कि चेन्नई की भौगोलिक स्थिति अलग है और पोर्ट का विकास करके माल ढुलाई को संभाला जा सकता है।

तमिलनाडु जल संसाधन विभाग के पूर्व उप प्रमुख और इंजीनियर इलांगोवन ने कहा कि परंदूर में चेन्नई को बाढ़ से बचाने वाली कई झीलें हैं और चेन्नई पहले ही काफ़ी विकसित हो चुका है। उनका सुझाव है कि तिरुचि हवाई अड्डे को अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बनाया जा सकता है, जो पूरे तमिलनाडु के लिए केंद्रीय स्थान होगा।

मायने और प्रभाव: आम जनता पर इसका क्या असर होगा?

परंदूर हवाई अड्डा परियोजना को रद्द करने का फैसला तमिलनाडु की आम जनता के लिए कई गहरे मायने रखता है। एक तरफ, यह पर्यावरण संरक्षण और किसानों के हितों की जीत के रूप में देखा जा रहा है। चेन्नई जैसे शहर में, जहाँ बाढ़ एक गंभीर समस्या है, जल निकायों और कृषि भूमि का संरक्षण भविष्य की आपदाओं से बचाव के लिए महत्वपूर्ण है। उन हज़ारों किसानों के लिए यह राहत की बात है जिनकी उपजाऊ ज़मीनें इस परियोजना की भेंट चढ़ सकती थीं।

दूसरी ओर, इस फैसले से राज्य के औद्योगिक विकास और रोज़गार सृजन पर संभावित असर को लेकर चिंताएँ भी हैं। चेन्नई, जो भारत के प्रमुख औद्योगिक और आईटी हब में से एक है, को भविष्य में बढ़ती हवाई यात्रा की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए एक आधुनिक बुनियादी ढाँचे की आवश्यकता है। उद्योग जगत का मानना है कि एक नया अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा न केवल विदेशी निवेश को आकर्षित करेगा, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति देगा।

सरकार के लिए यह एक संतुलन साधने की चुनौती है – पर्यावरण को बचाते हुए विकास के पहिये को कैसे आगे बढ़ाया जाए। मुख्यमंत्री ने वैकल्पिक स्थलों की तलाश की बात कहकर एक मध्यमार्ग निकालने की कोशिश की है। यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार किस तरह से इन दोनों महत्वपूर्ण पहलुओं को साध पाती है। यह फैसला राज्य की विकास रणनीति को एक नई दिशा देगा, जहाँ पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों को साथ लेकर चलने की ज़रूरत को समझा जा रहा है। आम जनता के लिए इसका सीधा मतलब बेहतर पर्यावरण, सुरक्षित भविष्य और संतुलित आर्थिक अवसरों की उम्मीद है।

Image Source: www.bbc.com

RELATED ARTICLES
- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments