देश की राजधानी दिल्ली और उससे सटे एनसीआर का दम एक बार फिर घुटने लगा है। दिवाली का त्योहार नजदीक है, लेकिन उससे पहले ही यहां की हवा ‘जहरीली’ हो चुकी है। वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) लगातार ‘बहुत खराब’ से ‘गंभीर’ श्रेणी में बना हुआ है, जिसने लोगों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। आलम यह है कि सुबह-शाम बाहर निकलना मुश्किल हो गया है और आंखों में जलन व सांस लेने में तकलीफ जैसी शिकायतें आम हो रही हैं।
दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का कहर: AQI 428 पार
राजधानी दिल्ली में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 428 के बेहद चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है, जो ‘गंभीर’ श्रेणी में आता है। दिल्ली के साथ-साथ नोएडा, गुरुग्राम, फरीदाबाद और गाजियाबाद जैसे एनसीआर के शहरों में भी हवा की गुणवत्ता खराब बनी हुई है। यह स्थिति ऐसे समय में आई है जब पराली जलाने और वाहनों से निकलने वाले धुएं के साथ-साथ मौसमी बदलाव भी प्रदूषण को बढ़ावा दे रहे हैं। मुंबई जैसे शहरों में भी धुंध की चादर छाई हुई है, जो वायु प्रदूषण के बढ़ते दायरे का संकेत है।
सरकार का ‘महा-एक्शन’: वर्क फ्रॉम होम और निर्माण कार्यों पर रोक
प्रदूषण के इस विकराल रूप को देखते हुए दिल्ली-एनसीआर प्रशासन हरकत में आ गया है। 5 नवंबर से 20 नवंबर तक कई कड़े कदम उठाए गए हैं। इनमें सबसे अहम है सरकारी और निजी कार्यालयों में 50 प्रतिशत कर्मचारियों के लिए ‘वर्क फ्रॉम होम’ का निर्देश। इसके अलावा, सभी प्रकार के निर्माण कार्यों पर भी तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गई है ताकि धूल और अन्य कणों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सके। ये उपाय लोगों को साफ हवा मुहैया कराने की दिशा में एक बड़ी कवायद हैं, लेकिन इनकी सफलता लोगों के सहयोग पर भी निर्भर करेगी।
देश के 18 राज्यों में आंधी-बारिश का अलर्ट
जहां एक तरफ दिल्ली-एनसीआर प्रदूषण की मार झेल रहा है, वहीं देश के 18 अन्य राज्यों में मौसमी बदलाव देखने को मिल रहे हैं। कई इलाकों में आंधी और बारिश का अलर्ट जारी किया गया है। हालांकि, दिल्ली-एनसीआर में हवा की गुणवत्ता सुधारने में बारिश कुछ हद तक मददगार हो सकती है, लेकिन बड़े पैमाने पर प्रदूषण के स्थायी समाधान के लिए दीर्घावधि नीतियों की जरूरत है।
मायने और प्रभाव: आम जनता पर क्या होगा असर?
दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते प्रदूषण का सीधा और सबसे गंभीर असर आम जनता के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। बच्चों, बुजुर्गों और सांस की बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए यह स्थिति जानलेवा साबित हो सकती है। लंबे समय तक ऐसी हवा में सांस लेने से फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारियां, हृदय रोग और यहां तक कि कैंसर का खतरा भी बढ़ जाता है।
- स्वास्थ्य पर खतरा: अस्पताल में सांस संबंधी बीमारियों के मरीजों की संख्या बढ़ रही है। मास्क पहनना अब सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत बन गया है।
- आर्थिक असर: ‘वर्क फ्रॉम होम’ से जहां कुछ लोगों को सहूलियत मिलेगी, वहीं निर्माण कार्यों पर रोक से दिहाड़ी मजदूरों और छोटे व्यापारियों की रोजी-रोटी पर संकट आ सकता है। यह अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक प्रभाव डालेगा।
- सामाजिक जीवन में बदलाव: लोग घर से बाहर निकलने से कतरा रहे हैं, जिससे सामाजिक गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं। बच्चों के खेलकूद और आउटडोर एक्टिविटीज पर भी बुरा असर पड़ रहा है।
यह स्थिति सिर्फ सरकारी उपायों से नहीं सुधरेगी, बल्कि इसमें हर नागरिक की भागीदारी जरूरी है। व्यक्तिगत स्तर पर वाहनों का कम इस्तेमाल, सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना और कचरा न जलाना जैसे कदम भी इस लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। आने वाले दिनों में दिवाली के दौरान पटाखों पर नियंत्रण और भी महत्वपूर्ण हो जाएगा ताकि हवा की गुणवत्ता और न बिगड़े। दिल्ली-एनसीआर को इस ‘जहरीली हवा’ से मुक्ति दिलाने के लिए सामूहिक प्रयास ही एकमात्र रास्ता है।
Image Source: news.google.com



