दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्ग लाल सागर में अब सुरक्षा का एक नया और मजबूत मोर्चा खुलने जा रहा है। सऊदी अरब ने इस रणनीतिक जलमार्ग में जहाजों को यमन के हूती विद्रोहियों के खतरनाक हमलों से बचाने के लिए एक विशाल अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाने का ऐलान किया है। इस पहल ने मध्य पूर्व की भू-राजनीति में एक नई हलचल पैदा कर दी है, जिसका सीधा असर वैश्विक व्यापार और तेल आपूर्ति पर पड़ना तय है।
रियाद से मिली जानकारी के अनुसार, सऊदी अरब ने इस गठबंधन में शामिल होने के लिए दुनिया भर के करीब 50 देशों को न्योता भेजा है। हालांकि, किन-किन देशों ने इसमें शामिल होने की पुष्टि की है, यह अभी आधिकारिक तौर पर सामने नहीं आया है, लेकिन इसकी औपचारिक घोषणा जल्द होने की उम्मीद है। यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है, जब हूती विद्रोही लगातार लाल सागर में जहाजों को निशाना बना रहे हैं, जिससे वैश्विक शिपिंग कंपनियों में भय का माहौल है।
हूती विद्रोहियों का बढ़ता खतरा
दरअसल, हूती विद्रोहियों ने 20 जुलाई को सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी की घोषणा की थी। उन्होंने चेतावनी दी थी कि सऊदी बंदरगाहों का इस्तेमाल करने वाले जहाजों पर हमला किया जा सकता है। इस चेतावनी के दो दिन बाद ही, 22 जुलाई की रात को हूतियों ने सऊदी तेल टैंकरों ‘इन्सेलिया’ और ‘लायला’ पर हमला कर दिया था, जिससे उनमें आग लग गई। इन हमलों ने लाल सागर की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं बढ़ा दी हैं।
कौन-कौन हो सकता है गठबंधन में शामिल?
मिडिल ईस्ट की खबरों पर नजर रखने वाली वेबसाइट अल-मॉनिटर के मुताबिक, अमेरिका, पाकिस्तान, मिस्र, तुर्किये, जिबूती, सोमालिया और सूडान जैसे देशों को इस गठबंधन में शामिल होने का निमंत्रण भेजा गया है। इसके अलावा जर्मनी, फ्रांस और इटली सहित कई यूरोपीय देशों को भी सऊदी अरब ने अपनी इस पहल में जोड़ने की कोशिश की है। अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से खबर है कि मिस्र, जिबूती और सूडान ने इस गठबंधन में शामिल होने पर अपनी सहमति दे दी है। अमेरिका भी इसमें शामिल हो सकता है, हालांकि उसने अभी तक इसकी पुष्टि नहीं की है।
कैसे काम करेगा यह नया सुरक्षा कवच?
विशेषज्ञों के अनुसार, यह अंतरराष्ट्रीय गठबंधन लाल सागर और बाब अल-मंदेब स्ट्रेट में जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कई ठोस कदम उठाएगा:
- युद्धपोतों की तैनाती: गठबंधन में शामिल देश अपने नौसैनिक युद्धपोतों को इन रणनीतिक समुद्री मार्गों में तैनात करेंगे। ये युद्धपोत लगातार गश्त करेंगे और व्यापारिक जहाजों को सुरक्षा प्रदान करेंगे।
- काफिले में जहाजों की आवाजाही: तेल टैंकर और मालवाहक जहाजों को अकेले भेजने के बजाय, अब उन्हें काफिले में भेजा जाएगा, जिनके साथ सुरक्षा के लिए युद्धपोत भी चलेंगे। इससे हमले की स्थिति में तुरंत जवाबी कार्रवाई की जा सकेगी।
- ड्रोन और मिसाइल हमलों की रोकथाम: हूती विद्रोही अक्सर ड्रोन, मिसाइल और विस्फोटकों से भरी नावों से हमला करते हैं। युद्धपोतों पर लगे एयर डिफेंस सिस्टम और रडार इन हमलों का पहले ही पता लगाकर उन्हें नाकाम करने की कोशिश करेंगे।
- हवाई निगरानी में वृद्धि: समुद्र के ऊपर ड्रोन, गश्ती विमान और निगरानी वाले विमान लगातार उड़ान भरेंगे। इससे हूती के लॉन्चिंग पॉइंट और किसी भी संदिग्ध गतिविधि का जल्द पता चल सकेगा।
- खुफिया जानकारी साझा करना: गठबंधन में शामिल देश रडार, सैटेलाइट और खुफिया एजेंसियों से मिली जानकारी एक-दूसरे के साथ साझा करेंगे, जिससे खतरे की पहले से चेतावनी मिल सकेगी।
सऊदी-अमेरिकी वार्ता और क्षेत्रीय समीकरण
इस बीच, सऊदी रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान ने हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के साथ आपातकालीन बैठक की। एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रिंस खालिद ने अमेरिका से साफ किया कि सऊदी अरब, अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव को और बढ़ाना नहीं चाहता, लेकिन जरूरत पड़ने पर अपनी रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि सऊदी अरब यमन के हूती विद्रोहियों से निपटने में सक्षम है और फिलहाल उसे अमेरिका की सैन्य मदद की जरूरत नहीं है।
दुनिया के लिए लाल सागर इतना अहम क्यों?
लाल सागर दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक है। इसके एक तरफ सऊदी अरब और यमन हैं, जबकि दूसरी तरफ मिस्र, सूडान, इरिट्रिया, जिबूती और सोमालिया स्थित हैं। दुनिया के करीब 30% समुद्री व्यापार का आवागमन इसी रास्ते से होता है। लाल सागर में आने-जाने के केवल दो मुख्य रास्ते हैं – पूर्व में बाब अल-मंदेब स्ट्रेट और पश्चिम में स्वेज नहर। इनमें से किसी भी रास्ते में रुकावट आने पर वैश्विक व्यापार और तेल आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ता है।
बाब अल-मंदेब अपने सबसे संकरे हिस्से में सिर्फ 29 किलोमीटर चौड़ा है, जिससे जहाजों के आने-जाने के लिए केवल दो समुद्री लेन उपलब्ध हैं। ईरान युद्ध के बाद होर्मुज स्ट्रेट पर नाकेबंदी के कारण सऊदी अरब अपना ज्यादातर तेल इसी रास्ते से भेज रहा है। अब इस रास्ते में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों का असर बढ़ गया है। सामान्य समय में दुनिया के लगभग 20% तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति होर्मुज स्ट्रेट से गुजरती है। अब होर्मुज स्ट्रेट और लाल सागर, दोनों क्षेत्रों में बढ़ते तनाव के कारण दुनिया की करीब 25% ऊर्जा आपूर्ति किसी न किसी रूप में इस संघर्ष से प्रभावित हो रही है।
हूती विद्रोहियों की नई ‘टैक्स’ योजना
रॉयटर्स के सूत्रों के मुताबिक, यमन के हूती विद्रोही लाल सागर के दक्षिणी हिस्से से गुजरने वाले कारोबारी जहाजों पर शुल्क लगाने की तैयारी कर रहे हैं। इस योजना को कब लागू किया जाएगा, यह अभी तय नहीं है। बताया जा रहा है कि जुलाई में ईरान में हुए खामेनेई के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए हूती नेता वहां गए थे, जहां ईरानी अधिकारियों ने उन्हें जहाजों पर टैक्स लगाने का विचार दिया था। बाद में ईरानी सलाहकारों ने टैक्स वसूलने की व्यवस्था बनाने में हूती अधिकारियों की मदद भी की। प्रस्ताव के तहत चीनी जहाजों को इस शुल्क से छूट दी जा सकती है, क्योंकि चीन सऊदी अरब से सबसे ज्यादा तेल खरीदने वाला देश है।
मायने और प्रभाव
सऊदी अरब का यह कदम लाल सागर में बढ़ती अस्थिरता के बीच एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। यह सिर्फ समुद्री सुरक्षा का मामला नहीं, बल्कि मध्य पूर्व की बदलती भू-राजनीति और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर इसके गहरे प्रभाव हैं।
- वैश्विक व्यापार पर असर: लाल सागर एक महत्वपूर्ण व्यापारिक धमनी है। यहां किसी भी तरह की अशांति का मतलब है शिपिंग लागत में वृद्धि और आपूर्ति श्रृंखला में देरी, जिसका सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्यात पर निर्भर देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
- तेल की कीमतें: कच्चे तेल की आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। सुरक्षा जोखिम बढ़ने से तेल की कीमतें अस्थिर हो सकती हैं, जिससे भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ सकते हैं, जो आम आदमी की जेब पर सीधा असर डालेगा।
- क्षेत्रीय स्थिरता: यह गठबंधन मध्य पूर्व में ईरान-सऊदी अरब के बीच चल रहे छद्म युद्ध को और गहरा सकता है। हालांकि, यह क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने का प्रयास भी है, लेकिन इसमें शामिल देशों के हितों का टकराव चुनौतियां पैदा कर सकता है।
- भारत के हित: भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और व्यापार के लिए लाल सागर मार्ग पर काफी निर्भर है। इस गठबंधन से अगर सुरक्षा बढ़ती है तो यह भारत के लिए अच्छी खबर होगी, लेकिन अगर तनाव बढ़ता है तो इससे भारतीय जहाजों और व्यापारिक हितों को भी खतरा हो सकता है।
कुल मिलाकर, लाल सागर में बनने वाला यह गठबंधन सिर्फ एक सैन्य पहल नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और भू-राजनीतिक संतुलन को प्रभावित करने वाला एक बड़ा कदम है। दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि यह गठबंधन हूती विद्रोहियों के आतंक को रोकने और इस महत्वपूर्ण जलमार्ग में शांति बहाल करने में कितना सफल होता है।



