देश की राजधानी दिल्ली का इंडिया गेट, जहां हर शाम चहल-पहल रहती है, मंगलवार को एक अलग ही मंज़र का गवाह बना। उत्तराखंड की अंकिता भंडारी के माता-पिता अपनी बेटी के लिए न्याय की गुहार लगाते हुए धरने पर बैठे थे। उनकी आँखों में दर्द था, तो आवाज़ में अपने कलेजे के टुकड़े के लिए इंसाफ की ललक। इस दुख की घड़ी में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ने उनसे मुलाकात कर अपना समर्थन जताया, लेकिन इसके साथ ही एक पुराना विवाद फिर से सुलग उठा है।
अंकिता भंडारी हत्याकांड: क्या है पूरा मामला?
यह मामला साल 2022 का है, जब उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल की रहने वाली 19 वर्षीय अंकिता भंडारी की हत्या कर दी गई थी। अंकिता एक रिसॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट का काम करती थीं, जिसके मालिक पुलकित आर्य पर उनकी हत्या का आरोप लगा। पुलकित आर्य भाजपा के एक पूर्व नेता का बेटा है, जिसने कथित तौर पर अंकिता पर अनैतिक काम करने का दबाव बनाया था। इस जघन्य घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था और न्याय की मांग को लेकर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए थे।
इंडिया गेट पर न्याय की हुंकार
अंकिता के माता-पिता अपनी बेटी को न्याय दिलाने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं। मंगलवार को वे इंडिया गेट पर धरने पर बैठे, ताकि उनकी आवाज़ सरकार और पूरे देश तक पहुँच सके। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने उनके बीच पहुंचकर उनका हालचाल जाना और उन्हें हर संभव मदद का भरोसा दिया।
इस मुलाकात के दौरान, अंकिता के पिता ने राहुल गांधी को एक ज्ञापन भी सौंपा, जिसमें उन्होंने अपनी कुछ प्रमुख मांगें रखीं। इसमें सबसे अहम मांग थी मामले की निष्पक्ष जांच और दोषियों को कड़ी से कड़ी सज़ा दिलाना। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें कई बार धमकियाँ मिली हैं और उन्हें अपनी सुरक्षा की चिंता है।
दुष्यंत गौतम पर क्यों उठ रहे सवाल?
इस पूरे घटनाक्रम में एक नाम बार-बार सामने आ रहा है – भाजपा नेता दुष्यंत गौतम का। दरअसल, अंकिता के माता-पिता और कांग्रेस पार्टी का आरोप है कि दुष्यंत गौतम का नाम इस हत्याकांड से जुड़े कुछ विवादों में आया था। अब उन्हें राज्यपाल बनाए जाने की खबरें हैं, जिस पर विपक्ष और पीड़ित परिवार ने गंभीर सवाल उठाए हैं।
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने इस पर तीखा हमला बोलते हुए पूछा, ‘आप किसे बचा रहे हैं? थोड़ा इंतज़ार तो कर लेते।’ उनका इशारा साफ था कि ऐसे संवेदनशील समय में जब एक नेता पर सवाल उठ रहे हों, उसे राज्यपाल जैसा संवैधानिक पद देना कहीं न कहीं न्याय की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।
विपक्ष का कहना है कि जब तक दुष्यंत गौतम से जुड़े विवादों की पूरी तरह से जांच नहीं हो जाती, तब तक उन्हें ऐसे महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त करना नैतिकता के खिलाफ है। यह पीड़ित परिवार के ज़ख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है और जनता के मन में संदेह पैदा करता है।
मायने और प्रभाव: आम जनता के लिए क्यों अहम है यह खबर?
अंकिता भंडारी हत्याकांड सिर्फ एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था और राजनीतिक जवाबदेही की कसौटी बन गया है। जब किसी हाई-प्रोफाइल मामले में राजनीतिक हस्तियों के नाम जुड़ते हैं और फिर उन पर सवाल उठते हैं, तो आम जनता का विश्वास डगमगाता है।
पीड़ित परिवार का दिल्ली के इंडिया गेट पर आकर न्याय की गुहार लगाना दिखाता है कि उन्हें स्थानीय स्तर पर शायद पूरी तरह से न्याय मिलने का भरोसा नहीं है। ऐसे में विपक्षी नेताओं का समर्थन उन्हें एक उम्मीद देता है और राष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे को फिर से उठाता है।
दुष्यंत गौतम जैसे नेता को राज्यपाल बनाने का विचार, जिस पर विवाद है, यह सवाल उठाता है कि क्या राजनीति में नैतिकता और पारदर्शिता को दरकिनार किया जा रहा है? यह आम आदमी के मन में यह आशंका पैदा करता है कि क्या प्रभावशाली लोगों को हमेशा बचाया जाता है और कानून की पहुँच उन तक नहीं होती?
यह खबर हमें याद दिलाती है कि न्याय केवल अदालतों से नहीं मिलता, बल्कि समाज और सरकार की इच्छाशक्ति से भी मिलता है। अंकिता के लिए न्याय की यह लड़ाई दरअसल हर उस व्यक्ति की लड़ाई है जो चाहता है कि कानून सभी के लिए समान हो, चाहे वह कितना भी ताकतवर क्यों न हो। यह मामला राजनीतिक दलों के लिए भी एक मौका है कि वे जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता को मज़बूत करें।



