अफगानिस्तान की धरती पर एक बार फिर इंसानियत कराह रही है। जहाँ मासूम बचपन को गरीबी और कट्टरता के बोझ तले कुचला जा रहा है, और बेटियाँ सिर्फ एक बोझ या कर्ज चुकाने का जरिया बन गई हैं। अफगानिस्तान समाचार से सामने आई यह दिल दहला देने वाली हकीकत पूरे विश्व को सोचने पर मजबूर कर रही है: कैसे भूख और तालिबान के फरमानों ने बाल विवाह को एक भयावह महामारी का रूप दे दिया है।
गरीबी और तालिबान के शिकंजे में बेटियां
तालिबान के सत्ता में आने के बाद से अफगानिस्तान में बाल विवाह के मामलों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। परिवार अब अपनी बेटियों को बेचने पर मजबूर हैं, ताकि वे कर्ज चुका सकें या अपने अन्य बच्चों का पेट भर सकें। यह सिर्फ एक सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि एक गहरा मानवीय संकट बन चुका है, जहाँ बच्चियों को खिलौनों की तरह खरीदा-बेचा जा रहा है।
बदघिस प्रांत की 18 वर्षीय सीमा की कहानी ऐसी ही कई लड़कियों की दास्तान बयां करती है। 13 साल की उम्र में उसे अपने पिता के दबाव और मारपीट के बाद शादी के लिए मजबूर किया गया। आज, वह चार बच्चों की माँ है, जिनमें से एक को उसने बीमारी में खो दिया। सीमा की तरह, हजारों लड़कियाँ शिक्षा से वंचित होकर कम उम्र में मातृत्व के बोझ तले दब रही हैं।
मासूमों की कीमत: कर्ज और भूख
यह सिर्फ सीमा की कहानी नहीं है। पश्चिमी अफगानिस्तान के कई परिवारों ने अपनी 9 साल से कम उम्र की बेटियों को कर्ज चुकाने के लिए बेच दिया है। इनमें दो महीने की बच्ची भी शामिल है, जिसे सात साल की उम्र में सौंपने का वादा किया गया है। 57 वर्षीय गोलनार और 51 वर्षीय साहेब जान जैसी दादी-नानी अपनी मासूम पोतियों को बेचने को मजबूर हैं, ताकि परिवार का पेट भर सके।
44 वर्षीय सबजा ने अपनी सात साल की बेटी को तीन साल की उम्र में ही 3 लाख अफगानी (लगभग 3,570 पाउंड) के कर्ज के बदले बेच दिया था। वह जानती है कि अगले एक साल में उसकी बेटी को ले जाया जाएगा, और यह सोचकर उसका दिल बैठा जाता है। ये कहानियाँ अफगानिस्तान में व्याप्त भीषण गरीबी और भुखमरी का भयावह चेहरा दिखाती हैं।
तालिबान राज और बिगड़ते हालात
तालिबान के सत्ता में आने के बाद से अफगानिस्तान में महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों का हनन तेजी से बढ़ा है। लड़कियों को छठी कक्षा के बाद स्कूल जाने से रोक दिया गया है, और विश्वविद्यालयों के दरवाजे भी उनके लिए बंद कर दिए गए हैं। पहले जहाँ 15 साल से कम उम्र में शादी अपराध थी, वहीं अब तालिबान के नए फरमान में न्यूनतम उम्र की कोई सीमा नहीं है।
इन नीतियों ने महिलाओं को शिक्षा और रोजगार दोनों से दूर कर दिया है, जिससे देश की आर्थिक बदहाली और भी गहरी हो गई है। बेरोजगारी चरम पर है और अंतरराष्ट्रीय सहायता में भी भारी गिरावट आई है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, अफगानिस्तान की लगभग तीन-चौथाई आबादी, यानी करीब 2.8 करोड़ लोग, अपनी बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं कर पा रहे हैं।
बचपन की कब्रगाह बनते अस्पताल
कम उम्र में शादी और गर्भावस्था का खामियाजा लड़कियों को शारीरिक और मानसिक रूप से भुगतना पड़ता है। उत्तरी अफगानिस्तान के एक सार्वजनिक अस्पताल के आंकड़ों के मुताबिक, इस साल के पहले पाँच महीनों में 42 नाबालिग लड़कियों ने बच्चों को जन्म दिया, जिनमें से कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही थीं। दो की तो मौत भी हो गई, हालाँकि उनके बच्चे बच गए।
विश्व स्वास्थ्य संगठन 20 साल से कम उम्र में गर्भावस्था को खतरनाक मानता है, क्योंकि इससे माँ और बच्चे दोनों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता है। अफगानिस्तान में मातृ मृत्यु दर प्रति 1 लाख जन्म पर 600 है, जबकि ईरान में यह 16 और पाकिस्तान में 155 है। यह आंकड़ा बताता है कि कैसे स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और महिलाओं पर पाबंदियों ने इस संकट को और गहरा दिया है।
मायने और प्रभाव
अफगानिस्तान में बाल विवाह का बढ़ता चलन सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी के भविष्य का बलिदान है। यह देश को गरीबी और अशिक्षा के एक दुष्चक्र में धकेल रहा है, जिससे उबरना बेहद मुश्किल होगा। जब बच्चियों को शिक्षा और विकास के अवसर नहीं मिलते, तो वे समाज के आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने में योगदान नहीं दे पातीं।
यह संकट अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए भी एक बड़ी चुनौती है। जहाँ दुनिया भर में बाल विवाह को रोकने के प्रयास हो रहे हैं, वहीं अफगानिस्तान में यह प्रथा फिर से जोर पकड़ रही है। यह न केवल मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन है, बल्कि एक स्थिर और शांतिपूर्ण अफगानिस्तान के निर्माण में भी एक बड़ी बाधा है। इस स्थिति पर तत्काल वैश्विक ध्यान और ठोस कार्रवाई की आवश्यकता है, ताकि इन मासूम जिंदगियों को बचाया जा सके और उन्हें एक बेहतर भविष्य मिल सके।
Image Source: www.theguardian.com



