अमेरिकी सपनों को संजोए लाखों भारतीय तकनीकी पेशेवरों के लिए एक और चिंताजनक खबर सामने आ रही है। ट्रंप प्रशासन, जो पहले से ही अपनी सख्त आव्रजन नीतियों के लिए जाना जाता है, अब H-1B और L-1 वीजा के नवीनीकरण पर भी भारी फीस लगाने की तैयारी में है। यह कदम अमेरिका में काम कर रहे भारतीय प्रोफेशनल्स और उन्हें नियुक्त करने वाली कंपनियों पर सीधा वित्तीय बोझ डालेगा।
क्या है यह नया प्रस्ताव?
अभी तक, अमेरिका में H-1B और L-1 वीजा के लिए ‘9-11 रिस्पॉन्स एंड बायोमेट्रिक एंट्री-एग्जिट फीस’ केवल नए आवेदनों पर लागू होती थी। इसके तहत, विदेशी पेशेवरों को नियुक्त करने वाली कंपनियों को नए H-1B आवेदन के लिए 4,000 डॉलर और L-1 आवेदन के लिए 4,500 डॉलर चुकाने पड़ते थे। यह फीस तब भी लगती है जब कोई कर्मचारी एक कंपनी से दूसरी कंपनी में जाता है।
लेकिन अब, अमेरिकी प्रशासन इन शुल्कों को वीजा नवीनीकरण (extension) आवेदनों पर भी अनिवार्य करने की योजना बना रहा है। यह नियम उन कंपनियों पर लागू होगा जिनके पास 50 या उससे अधिक कर्मचारी हैं, और उनमें से कम से कम आधे H-1B या L-1 वीजा पर काम कर रहे हैं।
भारतीय पेशेवरों पर सीधा असर
अमेरिकी नागरिकता और आव्रजन सेवाओं (USCIS) के आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2025 में स्वीकृत हुए 4,06,348 H-1B आवेदनों में से 2,91,542 (लगभग 72%) नवीनीकरण से संबंधित थे। इनमें से 2,26,359 (77.6%) आवेदन अकेले भारतीय नागरिकों के थे।
यह दिखाता है कि बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवर अपने वीजा का नवीनीकरण करवाते हैं। नए नियम लागू होने पर, उन कंपनियों को भारी अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ेगा जो बड़ी संख्या में भारतीय टेक प्रोफेशनल्स को नियुक्त करती हैं और उन्हें बनाए रखना चाहती हैं।
सरकार की कमाई, कंपनियों का बोझ
अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) का अनुमान है कि इस नए प्रस्ताव से हर साल अतिरिक्त 153 मिलियन डॉलर का राजस्व मिलेगा। यह कदम एक तरफ अमेरिकी सरकार के खजाने को भरेगा, वहीं दूसरी तरफ भारतीय पेशेवरों और उन्हें नियुक्त करने वाली अमेरिकी कंपनियों पर एक बड़ा वित्तीय बोझ डालेगा।
मायने और प्रभाव
यह फैसला सिर्फ फीस बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।
- भारतीयों पर वित्तीय दबाव: अमेरिका में काम कर रहे हजारों भारतीय टेक प्रोफेशनल्स को अब अपने वीजा नवीनीकरण के लिए भी मोटी रकम चुकानी पड़ सकती है, जिससे उनकी बचत और जीवनशैली प्रभावित होगी।
- कंपनियों के लिए चुनौती: अमेरिकी कंपनियां, खासकर जो भारतीय प्रतिभा पर बहुत अधिक निर्भर करती हैं, उन्हें अब अपने कर्मचारियों को बनाए रखने के लिए अधिक खर्च करना होगा। इससे उनकी परिचालन लागत बढ़ेगी और वे नई नियुक्तियों के बारे में दोबारा सोच सकती हैं।
- प्रतिस्पर्धा पर असर: कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम अमेरिकी कंपनियों को वैश्विक स्तर पर कम प्रतिस्पर्धी बना सकता है, क्योंकि उन्हें प्रतिभाशाली विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने और बनाए रखने के लिए अधिक भुगतान करना होगा।
- ‘ब्रेन ड्रेन’ पर असर: यह संभव है कि कुछ भारतीय पेशेवर, जो अमेरिका में रहने की लागत और वीजा फीस के बढ़ते बोझ से परेशान होंगे, वे कनाडा या यूरोप जैसे अन्य देशों की ओर रुख करें, जहां आव्रजन नीतियां थोड़ी उदार हैं।
- भारत के IT सेक्टर पर प्रभाव: यदि अमेरिकी कंपनियां भारतीय पेशेवरों को कम नियुक्त करना शुरू करती हैं, तो इसका असर भारत के विशाल IT सेवा उद्योग पर भी पड़ सकता है, जो अमेरिकी बाजार पर काफी निर्भर करता है।
कुल मिलाकर, यह प्रस्ताव भारतीय टेक समुदाय में चिंता का विषय बन गया है। अब देखना यह होगा कि यह प्रस्ताव कब तक कानून का रूप लेता है और इसका वास्तविक प्रभाव कितना गहरा होता है।
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