उत्तर प्रदेश के विकास की धुरी माने जा रहे कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे की चमक फीकी पड़ती दिख रही है। जिस एक्सप्रेसवे को लाखों यात्रियों के सफर को आसान और तेज़ बनाना था, वह आज खुद जगह-जगह से उखड़ा हुआ है। यह सिर्फ सड़क का मसला नहीं, बल्कि सरकारी धन के सही इस्तेमाल और निर्माण की गुणवत्ता पर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है।
हाल ही में सामने आई तस्वीरों और रिपोर्टों ने इस एक्सप्रेसवे की बदहाली को उजागर किया है। आलम यह है कि उद्घाटन के कुछ ही समय बाद, इसके कई हिस्से मरम्मत की बाट जोह रहे हैं। यह स्थिति आम जनता के लिए चिंता का विषय बन गई है, जो अपनी गाढ़ी कमाई का टैक्स देकर ऐसी परियोजनाओं की उम्मीद करती है।
लापरवाही के निशान, कदम-कदम पर मरम्मत
कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर सफर करने वालों के लिए अब ‘तेज़ रफ्तार’ से ज़्यादा ‘टूटी सड़क’ का अनुभव आम हो गया है। लगभग 100-100 मीटर के हिस्से उखाड़कर दोबारा बनाए जा रहे हैं। कई जगहों पर बड़े-बड़े पैचवर्क साफ दिखाई देते हैं, जो निर्माण में बरती गई कथित लापरवाही की कहानी बयां करते हैं।
इससे भी गंभीर बात यह है कि एक्सप्रेसवे के किनारे और कुछ हिस्सों में मिट्टी धंसने की शिकायतें भी मिली हैं। बारिश के मौसम में यह समस्या और भी गंभीर हो सकती है, जिससे यात्रियों की सुरक्षा पर सीधा खतरा मंडरा रहा है। यह एक्सप्रेसवे पर चलने वाले लाखों लोगों के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है।
गृह विभाग की पैनी नज़र, मांगी स्टेटस रिपोर्ट
एक्सप्रेसवे की इस बदहाली पर अब उत्तर प्रदेश के गृह विभाग ने सख्त रुख अपनाया है। विभाग ने इस पूरे मामले की गहन जांच के आदेश देते हुए संबंधित एजेंसियों से विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट मांगी है। यह कदम दर्शाता है कि सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से ले रही है और जवाबदेही तय करने के मूड में है।
गृह विभाग की यह सक्रियता निश्चित तौर पर उन निर्माण एजेंसियों पर दबाव बढ़ाएगी, जिन पर एक्सप्रेसवे के रखरखाव और गुणवत्ता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है। उम्मीद है कि इस रिपोर्ट के बाद न सिर्फ मरम्मत का काम तेज़ी से होगा, बल्कि भविष्य में ऐसी लापरवाही पर लगाम भी लगेगी।
मायने और प्रभाव: जनता के पैसे का क्या?
कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे की यह स्थिति कई गंभीर सवाल खड़े करती है। सबसे पहला सवाल तो यह है कि जब करोड़ों-अरबों रुपये की लागत से कोई परियोजना बनती है, तो उसकी गुणवत्ता इतनी खराब क्यों होती है? क्या निर्माण के दौरान तय मानकों का पालन नहीं किया गया?
दूसरा, यह जनता के टैक्स के पैसे का सीधा दुरुपयोग है। बार-बार मरम्मत का मतलब है, सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ। यह पैसा विकास के अन्य मदों में इस्तेमाल हो सकता था। तीसरा, और सबसे महत्वपूर्ण, यह सड़क सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है। खराब सड़कें दुर्घटनाओं को न्योता देती हैं, जिससे अनमोल जानें जा सकती हैं।
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में जहां इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर भारी निवेश हो रहा है, वहां कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे का यह हाल एक चेतावनी की तरह है। सरकार को न सिर्फ मौजूदा समस्या का समाधान करना होगा, बल्कि भविष्य की परियोजनाओं में गुणवत्ता नियंत्रण और जवाबदेही के लिए सख्त तंत्र भी बनाना होगा, ताकि ‘विकास’ के नाम पर ‘लापरवाही’ का ग्रहण न लगे।
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