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गोरखपुर की सुशीला देवी: आम की छाल से रंगती हैं टेराकोटा, हुनर को मिल रही ODOP की उड़ान

क्या आपने कभी सोचा है कि मिट्टी की मूर्तियों में रंग भरने के लिए प्रकृति का ही इस्तेमाल हो सकता है? गोरखपुर की एक ऐसी ही महिला हैं सुशीला देवी, जिन्होंने अपने हुनर और प्रकृति के मेल से एक अनूठी पहचान बनाई है। वह न केवल खूबसूरत टेराकोटा की मूर्तियां गढ़ती हैं, बल्कि उन्हें रंगने के लिए बाजार से रंग खरीदने के बजाय, घर पर ही आम की छाल से ऑर्गेनिक रंग तैयार करती हैं।

गोरखपुर की सुशीला देवी: मिट्टी और प्रकृति का अनोखा संगम

गोरखपुर की सुशीला देवी उन चुनिंदा कारीगरों में से हैं, जो पारंपरिक टेराकोटा कला को एक नया आयाम दे रही हैं। उनकी बनाई मूर्तियां अपनी बारीकी और सुंदरता के लिए जानी जाती हैं। लेकिन जो बात उन्हें दूसरों से अलग बनाती है, वह है उनका प्रकृति प्रेम और नवाचार। वह अपनी कला में रंगों के लिए पूरी तरह से प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर करती हैं।

आम की छाल से तैयार होता है खास ऑर्गेनिक रंग

सुशीला देवी के लिए यह सिर्फ एक रंग नहीं, बल्कि एक पूरी प्रक्रिया है। वह बताती हैं कि ऑर्गेनिक टेराकोटा रंग बनाना कोई आसान काम नहीं। इसके लिए सबसे पहले आम की डालियों और उनकी छाल को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ा जाता है। फिर इन टुकड़ों को खास तरीके से तैयार किया जाता है, जिससे इनसे चमकीले और टिकाऊ रंग निकाले जा सकें। यह प्रक्रिया न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि मूर्तियों को एक प्राकृतिक और अलग ही चमक भी देती है।

ODOP योजना दे रही हुनर को नई पहचान

सुशीला देवी का यह अनूठा हुनर अब ‘एक जिला एक उत्पाद’ (ODOP) योजना के तहत पहचान पा रहा है। इस योजना का मकसद स्थानीय शिल्प और उत्पादों को बढ़ावा देना है, और गोरखपुर में टेराकोटा इसका प्रमुख उत्पाद है। ODOP के समर्थन से सुशीला देवी जैसी कारीगरों को अपने उत्पादों को बड़े बाजार तक पहुंचाने और अपनी कला को जीवित रखने में मदद मिल रही है। यह उनके काम को सिर्फ एक शौक नहीं, बल्कि एक सम्मानजनक आजीविका का साधन बना रहा है।

मायने और प्रभाव

  • स्थानीय कला और अर्थव्यवस्था को बढ़ावा: सुशीला देवी का काम गोरखपुर की टेराकोटा कला को वैश्विक मंच पर पहचान दिला रहा है। यह स्थानीय कारीगरों को प्रेरित करता है और इस क्षेत्र में रोजगार के अवसर पैदा करता है।
  • पर्यावरण संरक्षण का संदेश: ऑर्गेनिक रंगों का इस्तेमाल न केवल मूर्तियों को अनूठा बनाता है, बल्कि यह पर्यावरण के प्रति जागरूकता भी फैलाता है। यह रासायनिक रंगों के बजाय प्राकृतिक विकल्पों को अपनाने की प्रेरणा देता है।
  • महिला सशक्तिकरण का प्रतीक: सुशीला देवी जैसी महिलाएं अपनी कला और दृढ़ संकल्प से आत्मनिर्भर बन रही हैं। वे समाज में अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं, जो दिखाती हैं कि कैसे पारंपरिक कौशल को आधुनिक नवाचार के साथ जोड़ा जा सकता है।
  • ODOP की सफलता का उदाहरण: यह कहानी दर्शाती है कि कैसे ODOP जैसी सरकारी योजनाएं जमीनी स्तर पर कारीगरों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकती हैं, उनके हुनर को पहचान दिला सकती हैं और उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त कर सकती हैं।
  • सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण: टेराकोटा की यह कला सदियों पुरानी है। सुशीला देवी जैसे कलाकार इसे नए तरीकों से पुनर्जीवित करके हमारी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित कर रहे हैं।

Image Source: hindi.news18.com

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