दिल्ली की सड़कों पर एक बार फिर विपक्ष का सैलाब उमड़ा। INDIA गठबंधन ने अपनी एकजुटता और ताकत का प्रदर्शन करते हुए राजधानी में एक भव्य मार्च निकाला। यह मार्च कॉन्स्टिट्यूशन क्लब से शुरू होकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां विपक्षी नेताओं ने ‘वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी’ और ‘मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) में अनियमितताओं’ को लेकर एक याचिका दायर की। यह प्रदर्शन ऐसे समय में हुआ जब दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को विरोध स्थल के रूप में डिनोटिफाई कर दिया था, लेकिन इसके बावजूद विपक्ष की आवाज़ बुलंद रही।
दिल्ली की सड़कों पर ‘लोकतंत्र बचाओ’ का नारा
12 अक्टूबर, 2026 को दोपहर 1:30 बजे कॉन्स्टिट्यूशन क्लब से शुरू हुआ यह ‘लोकतंत्र बचाओ मार्च’ चार घंटे से भी ज़्यादा समय तक चला। कांग्रेस का दावा है कि इस प्रदर्शन में लगभग 2.5 लाख लोग शामिल हुए। इनमें अधिकतर कांग्रेस समर्थक थे जो देश के अलग-अलग कोनों से दिल्ली पहुंचे थे। मार्च के दौरान भारी पुलिस बल तैनात था, लेकिन प्रदर्शनकारियों को ज़्यादा बाधा नहीं डाली गई। कई जगह तो पुलिस बैरिकेड्स के बावजूद काफिला आगे बढ़ता रहा।
विपक्षी एकता का प्रदर्शन
इस मार्च की अगुवाई राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे बड़े नेताओं ने की। उनके साथ सपा के धर्मेंद्र यादव, राजद के तेजस्वी यादव, शिवसेना (यूबीटी) के संजय राउत, तृणमूल के सौगत राय, सीपीआई (एम) के एम.ए. बेबी और सीपीआई (एमएल) के दीपांकर भट्टाचार्य जैसे INDIA गठबंधन के प्रमुख चेहरे भी मौजूद थे। नेताओं से भरी एक बस सबसे आगे चल रही थी, जिससे वे भीड़ का अभिवादन कर रहे थे। हालांकि, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और सपा प्रमुख अखिलेश यादव जैसे कुछ बड़े नेता बाद में शामिल हुए या पूरे मार्च में नहीं रह पाए।
विरोध मार्च में कांग्रेस के झंडों की भरमार थी, हालांकि INDIA गठबंधन ने राष्ट्रीय ध्वज फहराने का प्रस्ताव दिया था। सीपीआई(एम) की एसएफआई, सीपीआई की एआईएसएफ और सीपीआई(एमएल) की आइसा जैसे वामपंथी छात्र संगठनों के झंडे भी लहराते दिखे।
अलग-अलग राज्यों से आए प्रदर्शनकारी
इस मार्च में कई ऐसे चेहरे थे जो दूर-दराज़ के इलाकों से अपनी बात दिल्ली तक पहुंचाने आए थे। ओडिशा के कोरापुट से पहली बार दिल्ली आईं 36 वर्षीय सलमा बेगम ने बताया कि वह राहुल गांधी से मिलने आई हैं। वहीं, दौसा से आई सबो मीना ने कहा, “देश खतरे में है, इसको मोदी जी से मुक्त करना है।” हरियाणा के बादकल से आए पूर्व युवा कांग्रेस नेता मयंक चौधरी अपने काफिले के साथ पुलिस बैरिकेड्स को चकमा देते हुए पहुंचे। पंजाब के जालंधर से आए दविंदर सिंह तो यमराज का वेश धारण कर सरकार को यह याद दिलाने आए थे कि उन्हें भी अपने कर्मों का हिसाब देना होगा।
CJI की टिप्पणी और ज़मीनी हकीकत
इस बीच, मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने टिप्पणी की कि लोकतांत्रिक और राजनीतिक विरोध प्रदर्शन होने चाहिए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट को इसमें घसीटा नहीं जाना चाहिए। यह टिप्पणी ऐसे समय में आई जब विपक्षी दल लगातार चुनाव आयोग और सरकार पर चुनावी प्रक्रिया में हेरफेर का आरोप लगा रहे हैं।
प्रदर्शन के बीच, सीतामढ़ी, बिहार से आए नारायण साह पापड़ बेचते हुए दिखे। उन्हें वोटर लिस्ट की गड़बड़ी से ज़्यादा अपने गांव में भाई का राशन कार्ड कटने और बढ़ती महंगाई के कारण पेंशन न मिलने की चिंता थी। यह दिखाता है कि ज़मीनी स्तर पर आम जनता की परेशानियां केवल चुनावी मुद्दों तक ही सीमित नहीं हैं।
मायने और प्रभाव
INDIA गठबंधन का यह मार्च कई मायनों में अहम है। सबसे पहले, यह विपक्षी एकता का एक बड़ा प्रदर्शन था, खासकर ऐसे समय में जब लोकसभा चुनाव नज़दीक आ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर उन्होंने चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता की मांग को एक कानूनी जामा पहनाया है। यह सरकार और चुनाव आयोग पर दबाव बनाने का एक सीधा प्रयास है।
आम जनता के लिए, यह मार्च वोटर लिस्ट में संभावित गड़बड़ियों और उनके मतदान के अधिकार पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंताएं बढ़ाता है। अगर मतदाता सूची में सचमुच बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हैं, तो यह लोकतंत्र की बुनियाद को कमज़ोर कर सकता है। इस प्रदर्शन ने यह भी उजागर किया कि जनता की चिंताएं केवल बड़े राजनीतिक मुद्दों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि राशन कार्ड, पेंशन और महंगाई जैसे रोज़मर्रा के मुद्दे भी उनके लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं। यह सरकार के लिए एक संकेत है कि उसे सिर्फ चुनावी वादों पर नहीं, बल्कि ज़मीनी हकीकत पर भी ध्यान देना होगा। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर क्या रुख अपनाता है और इस मार्च का चुनावी राजनीति पर क्या असर पड़ता है।



