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नंदीग्राम का रण: ममता बनर्जी की TMC के सामने ‘फाल्टा’ जैसी चुनौती, क्या मिलेगा उम्मीदवार?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर नंदीग्राम का नाम जोर-शोर से गूँज रहा है। यह वो सीट है जिसने एक समय ममता बनर्जी के राजनीतिक उदय की कहानी लिखी, लेकिन अब यही सीट उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है। आगामी 6 अक्टूबर को होने वाले उपचुनाव से पहले, TMC को यहाँ उम्मीदवार तलाशने में पसीना आ रहा है, और कई राजनीतिक विश्लेषक इसे फाल्टा में हुए पिछले झटके से जोड़कर देख रहे हैं।

नंदीग्राम: एक ऐतिहासिक रणभूमि

नंदीग्राम सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति का एक अहम अध्याय है। साल 2007 में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ चले आंदोलन ने ममता बनर्जी को एक जननेता के रूप में स्थापित किया और TMC के सत्ता में आने का मार्ग प्रशस्त किया। यह सीट उनकी पार्टी का गढ़ मानी जाती रही है, लेकिन 2021 और 2026 के विधानसभा चुनावों में शुभेंदु अधिकारी ने यहाँ से जीत दर्ज कर इसे भाजपा का मजबूत किला बना दिया है।

आपको याद होगा, 2026 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने भवानीपुर और नंदीग्राम दोनों सीटों पर जीत हासिल की थी। बाद में उन्होंने भवानीपुर को अपने पास रखा और नंदीग्राम सीट छोड़ दी, जिसके कारण अब यहाँ उपचुनाव हो रहा है। सवाल यह है कि क्या TMC इस प्रतिष्ठित सीट पर अपनी साख बचा पाएगी?

फाल्टा का सबक: क्या दोहराएगा इतिहास?

यह संकट कुछ हद तक तीन महीने पहले फाल्टा में हुए घटनाक्रम जैसा ही लग रहा है। तब विधानसभा चुनाव के दौरान, तृणमूल कांग्रेस के बाहुबली उम्मीदवार जहांगीर खान उर्फ ‘पुष्पा’ ने मतदान से ठीक दो दिन पहले अचानक अपना नाम वापस ले लिया था। इस अप्रत्याशित कदम से TMC को बड़ा झटका लगा और आखिरकार भाजपा ने उस सीट पर जीत दर्ज की, जो अभिषेक बनर्जी के संसदीय क्षेत्र डायमंड हार्बर में आती है और 2011 से TMC का गढ़ रही थी।

उस समय TMC ने इसे जहांगीर का निजी फैसला बताया था, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा गर्म थी कि पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है। अब नंदीग्राम में भी कुछ ऐसे ही संकेत मिल रहे हैं, जहाँ पार्टी को उम्मीदवार चुनने में खासी मशक्कत करनी पड़ रही है।

नंदीग्राम में TMC की चुनौतियाँ

नंदीग्राम में अभी स्थिति फाल्टा जैसी गंभीर तो नहीं हुई है, लेकिन पार्टी के सामने मुश्किलें साफ दिख रही हैं। पहला संकेत मंगलवार को हुई सर्वदलीय बैठक से मिला, जहाँ TMC को छोड़कर सभी प्रमुख दल मौजूद थे। इससे यह अटकलें तेज हो गईं कि क्या पार्टी यहाँ से उम्मीदवार उतारेगी भी या नहीं।

दूसरा बड़ा संकेत पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की अनिच्छा से मिल रहा है। TMC से लंबे समय से जुड़े अबू ताहेर ने तो साफ कह दिया है कि ममता बनर्जी को खुद चुनाव लड़ना चाहिए और ‘मैं क्यों लड़ूं।’ उन्होंने अपनी उपेक्षा का हवाला देते हुए कहा कि 15 साल सत्ता में रहने के बावजूद उन्हें कभी उम्मीदवार नहीं माना गया, तो अब ‘बलि का बकरा’ क्यों बनाया जाए? उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि पार्टी कहने पर भी वे चुनाव नहीं लड़ेंगे।

तीसरा संकेत पार्टी के भीतर चल रही गुटबाजी से मिल रहा है। TMC अब दो धड़ों में बंटी नजर आ रही है, एक की अगुवाई ऋताब्रत बनर्जी कर रहे हैं और दूसरे को ‘कालीघाट TMC’ कहा जा रहा है। हालांकि, पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न अभी भी ममता बनर्जी वाले गुट के पास ही है, लेकिन यह आंतरिक कलह निश्चित रूप से पार्टी की एकजुटता पर सवाल खड़े करती है।

मायने और प्रभाव

नंदीग्राम उपचुनाव सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं है, बल्कि यह पश्चिम बंगाल की राजनीति के लिए कई गहरे मायने रखता है।

  • TMC की साख का सवाल: यह सीट ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न है। अगर TMC यहाँ से उम्मीदवार उतारने में विफल रहती है या हार जाती है, तो यह पार्टी के मनोबल और राज्य में उसकी पकड़ पर गंभीर सवाल खड़े करेगा।
  • शुभेंदु अधिकारी बनाम ममता बनर्जी: यह चुनाव शुभेंदु अधिकारी और ममता बनर्जी के बीच के राजनीतिक द्वंद्व का एक और अध्याय होगा। शुभेंदु ने नंदीग्राम से ही ममता बनर्जी को हराया था, और इस सीट पर TMC की कमजोरी भाजपा को और मजबूत करेगी।
  • आंतरिक कलह का प्रदर्शन: उम्मीदवार न मिलना या नेताओं का चुनाव लड़ने से इनकार करना TMC के भीतर बढ़ती आंतरिक कलह और गुटबाजी को उजागर करता है। यह दिखाता है कि पार्टी में सब कुछ ठीक नहीं है और नेतृत्व को इन चुनौतियों से निपटना होगा।
  • आम जनता पर असर: राजनीतिक अस्थिरता या कमजोर नेतृत्व का असर अंततः आम जनता पर पड़ता है। अगर एक प्रमुख पार्टी अपने ही गढ़ में कमजोर दिखती है, तो यह राज्य की राजनीतिक दिशा को प्रभावित कर सकता है।

देखना यह होगा कि क्या ममता बनर्जी और उनकी पार्टी इस चुनौती का सामना कर पाती है, या नंदीग्राम का रण उनके लिए ‘फाल्टा’ जैसा एक और कड़वा अनुभव साबित होगा।

Image Source: www.livehindustan.com

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