उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में बुधवार शाम एक भीषण सड़क हादसे ने पूरे बिसंडा कस्बे को दहला दिया। यह सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि लोगों की अनसुनी चीखें और प्रशासनिक उदासीनता का भयावह नतीजा है, जिसने एक साथ छह जिंदगियां छीन लीं। ईद के पवित्र त्योहार से ठीक पहले हुए इस हादसे ने कई घरों की खुशियों को मातम में बदल दिया है, जहां अब सिर्फ चीख-पुकार और सन्नाटा पसरा है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि अगर समय रहते भारी वाहनों के लिए ‘नो-इंट्री’ लागू कर दी जाती, तो शायद यह हृदय विदारक मंजर देखने को न मिलता। यह घटना एक बार फिर सड़क सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
बांदा में दिल दहला देने वाला हादसा: नो-इंट्री की मांग क्यों हुई अनसुनी?
बिसंडा कस्बे में बुधवार शाम एक अनियंत्रित ट्रॉले ने ई-रिक्शा को रौंद दिया, जिससे छह लोगों की मौके पर ही मौत हो गई और कई अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। यह हादसा उस वक्त हुआ, जब लोग ईद की खरीदारी के लिए बिसंडा बाजार जा रहे थे। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, तेज रफ्तार और ओवरलोड बालू से लदा ट्रॉला कस्बे के भीतर से गुजर रहा था, जबकि स्थानीय लोग लंबे समय से यहां भारी वाहनों की ‘नो-इंट्री’ की मांग कर रहे थे।
हादसे की सूचना मिलते ही अपर पुलिस अधीक्षक डॉ. शिवराज और एडीएम मायाशंकर मौके पर पहुंचे। उन्होंने मृतकों के परिजनों और स्थानीय लोगों को समझाने की कोशिश की, लेकिन लोग मुआवजे के साथ-साथ तत्काल ‘नो-इंट्री’ लागू करने की मांग पर अड़े रहे। उनका कहना था कि कई बार ज्ञापन देने के बावजूद प्रशासन ने उनकी सुध नहीं ली।
ईद की खुशियां मातम में बदलीं: उजड़ गए कई परिवार
इस हादसे ने कोर्रही गांव के कई परिवारों को हमेशा के लिए तोड़ दिया है। मृतकों में दो मुस्लिम परिवारों के सदस्य भी शामिल हैं, जिनके घर ईद से ठीक एक दिन पहले खुशियों की जगह मातम छा गया है। मुबीन (40) सऊदी अरब में रहकर कमाते थे और छह साल बाद दो महीने पहले ही अपने गांव लौटे थे। ईद की खरीदारी के लिए बिसंडा जाते समय ओरन रोड के पास उनकी मौत हो गई, जिससे उनके दो छोटे बच्चों ने अपने पिता को खो दिया।
इसी ई-रिक्शा में सवार शबाना (40) भी अपने पति पीरू के साथ मुंबई में रहती थीं और अपने 10 वर्षीय बेटे शहबाज और तीन माह की बेटी साफिया के साथ ईद की खरीदारी के लिए निकली थीं। लेकिन सड़क पर मौत बन कर आए ट्रॉले ने उनके मासूम बेटे शहबाज को छीन लिया। शबाना और उनकी नवजात बेटी साफिया घायल अवस्था में अस्पताल में भर्ती हैं।
हादसे में बचे मासूम, खोया भाई: मां की गोद ने दी पनाह
इस भीषण हादसे में जहां कई जिंदगियां काल के गाल में समा गईं, वहीं तीन माह की मासूम साफिया अपनी मां शबाना की गोद में सुरक्षित बच गई। बताया जाता है कि हादसे के वक्त शबाना ने अपनी बेटी को आंचल में छिपा लिया था, जिससे मासूम को खरोंच तक नहीं आई। हालांकि, इस बचाव के बीच उसने अपने 10 वर्षीय भाई शहबाज को खो दिया। यह घटना मां के अदम्य साहस और एक परिवार की त्रासदी को बयां करती है।
मृतकों में ई-रिक्शा चालक राकेश, ममता और सोहनलाल भी शामिल हैं, जिनकी जिला अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई। सोहनलाल की पत्नी बौरी और बेटी शिवकली का रो-रोकर बुरा हाल है। बिसंडा थाना इंस्पेक्टर सुखराम सिंह ने बताया कि परिजनों की तहरीर पर आगे की कार्रवाई की जा रही है।
मायने और प्रभाव: क्या बदलेंगी प्रशासनिक नीतियां?
बांदा के बिसंडा में हुआ यह दर्दनाक हादसा केवल एक सड़क दुर्घटना नहीं, बल्कि दशकों से चली आ रही प्रशासनिक लापरवाही और जनहित की अनदेखी का जीता-जागता प्रमाण है। स्थानीय लोगों की बार-बार की गई ‘नो-इंट्री’ की मांग को अनसुना करना, इस त्रासदी की सबसे बड़ी वजह बनकर सामने आया है। यह घटना हमें कई गंभीर सवाल पूछने पर मजबूर करती है:
- जन सुरक्षा बनाम आर्थिक हित: क्या भारी वाहनों के बेरोकटोक आवागमन से होने वाले आर्थिक लाभ, आम जनता की जान से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं?
- जवाबदेही का अभाव: उन अधिकारियों की जवाबदेही कौन तय करेगा, जिन्होंने लगातार मिल रही शिकायतों और ज्ञापनों पर कोई कार्रवाई नहीं की?
- त्योहारों पर सुरक्षा: त्योहारों के समय जब बाजारों में भीड़ बढ़ती है, तब यातायात प्रबंधन और सुरक्षा के लिए क्या विशेष कदम उठाए जाते हैं?
- स्थायी समाधान की जरूरत: क्या केवल मुआवजे से ऐसी त्रासदियों का समाधान हो सकता है, या फिर स्थायी ट्रैफिक प्रबंधन और शहरी नियोजन की सख्त जरूरत है?
यह हादसा बांदा और आसपास के क्षेत्रों में सड़क सुरक्षा की स्थिति पर एक गहरी चिंता पैदा करता है। यह समय है जब सरकार और स्थानीय प्रशासन को ठोस कदम उठाने होंगे। सिर्फ जांच और मुआवजे की घोषणाओं से काम नहीं चलेगा, बल्कि यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में ऐसी किसी भी लापरवाही की कीमत निर्दोष जिंदगियों को न चुकानी पड़े। स्थानीय लोगों के दबाव और मीडिया की सक्रियता ही शायद प्रशासनिक नींद तोड़ पाएगी और ‘नो-इंट्री’ जैसी महत्वपूर्ण मांगों को अमली जामा पहना पाएगी।
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