मध्य प्रदेश की राज्यसभा सियासत में अचानक आए एक सियासी भूचाल ने कांग्रेस के सारे समीकरण हिला दिए हैं। रविवार की रात बीजेपी ने एक ऐसा दांव चला है, जिसकी उम्मीद शायद ही किसी ने की होगी। दो सीटों पर अपनी जीत सुनिश्चित करने के बाद, बीजेपी ने तीसरी सीट पर बुंदेलखंड के ओबीसी चेहरे महेश केवट को उतारकर, अब तक निर्विरोध जीत की उम्मीद कर रही कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन के सामने एक कांटे की टक्कर खड़ी कर दी है।
सोमवार को नामांकन की आखिरी तारीख है और बीजेपी के इस अप्रत्याशित फैसले से अब क्रॉस वोटिंग की आशंका बढ़ गई है, जिसने भोपाल से लेकर दिल्ली तक सियासी हलचल तेज कर दी है।
कौन हैं महेश केवट? बीजेपी का यह ‘मास्टरस्ट्रोक’ क्यों?
महेश केवट का राजनीतिक सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। एक समय उन्हें नगरीय निकाय चुनाव में पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में बीजेपी से 6 साल के लिए बाहर कर दिया गया था। लेकिन संघ पृष्ठभूमि से आने वाले केवट ने अपनी मेहनत और संगठन के प्रति निष्ठा से एक बार फिर भरोसा जीता। अप्रैल में उन्हें मछुआ कल्याण बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया और अब सीधे राज्यसभा का टिकट देकर बीजेपी ने सबको चौंका दिया है।
बीजेपी ने महेश केवट को मैदान में उतारकर एक साथ कई निशाने साधे हैं। यह कदम बुंदेलखंड क्षेत्र में केवट समाज और अन्य अति पिछड़ा वर्ग (OBC) को साधने की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। बीजेपी इस ‘अति पिछड़ा कार्ड’ से क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरणों को अपने पक्ष में मजबूत करना चाहती है।
मीनाक्षी नटराजन की राह हुई मुश्किल
कांग्रेस ने दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह की जगह मीनाक्षी नटराजन को उम्मीदवार बनाया था और पार्टी को उम्मीद थी कि वह आसानी से राज्यसभा पहुंच जाएंगी। लेकिन बीजेपी के इस अचानक आए फैसले ने उनकी जीत की राह को बेहद मुश्किल बना दिया है। अब कांग्रेस नेतृत्व तुरंत सक्रिय हो गया है और अपने विधायकों को एकजुट रखने की चुनौती का सामना कर रहा है, ताकि क्रॉस वोटिंग को रोका जा सके।
बीजेपी की मैराथन बैठकों का नतीजा
शनिवार और रविवार को भोपाल में बीजेपी के शीर्ष नेताओं के बीच एससी, एसटी और ओबीसी चेहरों को लेकर लंबी चर्चा हुई थी। दिल्ली में भी इस पर गहन मंथन चला, जिसके बाद महेश केवट के नाम पर मुहर लगाई गई। यह फैसला दर्शाता है कि बीजेपी ने पूरी तैयारी और रणनीति के साथ यह कदम उठाया है।
अगर सोमवार को दोनों पक्षों के नामांकन वैध पाए जाते हैं, तो 18 जून को होने वाली वोटिंग में मध्य प्रदेश में राज्यसभा की तीसरी सीट के लिए एक जबरदस्त मुकाबला देखने को मिलेगा।
आंकड़ों का खेल और क्रॉस वोटिंग का डर
बीजेपी के पास अपने दो उम्मीदवारों तरुण चुग और रजनीश अग्रवाल को जिताने के बाद भी अतिरिक्त वोट बच रहे हैं। ये अतिरिक्त वोट कांग्रेस के किले में सेंध लगाने के लिए पर्याप्त माने जा रहे हैं। हालांकि, आंकड़ों के हिसाब से कांग्रेस के पास बीजेपी से 5 वोट ज्यादा हैं, लेकिन बीजेपी ने अगर महेश केवट को मैदान में उतारा है, तो यह बिना किसी ठोस रणनीति और ‘नंबर गेम’ के नहीं हुआ होगा। अब सवाल यह है कि क्या कांग्रेस के कुछ विधायक पाला बदलकर बीजेपी उम्मीदवार के पक्ष में वोट करेंगे?
मायने और प्रभाव: मध्य प्रदेश की राजनीति पर गहरा असर
बीजेपी का यह ‘सरप्राइज’ दांव केवल एक राज्यसभा सीट जीतने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके मध्य प्रदेश की राजनीति पर गहरे और दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे।
- ओबीसी वोट बैंक पर पकड़: महेश केवट को आगे करके बीजेपी ने बुंदेलखंड समेत पूरे प्रदेश में ओबीसी वोट बैंक को एक मजबूत संदेश दिया है। यह आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों में पार्टी के लिए फायदेमंद हो सकता है।
- कांग्रेस पर दबाव: इस कदम ने कांग्रेस पर भारी दबाव बढ़ा दिया है। अब उसे न केवल अपने विधायकों को एकजुट रखना होगा, बल्कि भविष्य में ऐसे ‘सरप्राइज’ हमलों से निपटने की रणनीति भी बनानी होगी। पार्टी में अंदरूनी खींचतान बढ़ने की भी आशंका है।
- क्षेत्रीय संतुलन: बुंदेलखंड से एक ओबीसी चेहरे को मौका देकर बीजेपी ने क्षेत्रीय और जातीय संतुलन साधने की कोशिश की है, जो राज्य की राजनीति में हमेशा महत्वपूर्ण रहा है।
- संदेश की राजनीति: यह बीजेपी की उस रणनीति का हिस्सा है, जहां वह छोटे और नए चेहरों को अवसर देकर संगठन में कार्यकर्ताओं का भरोसा बढ़ाती है और वंशवाद की राजनीति पर परोक्ष रूप से हमला करती है।
कुल मिलाकर, मध्य प्रदेश की राज्यसभा सियासत में यह एक ऐसा मोड़ है, जो आने वाले दिनों में और भी कई दिलचस्प समीकरणों को जन्म देगा। मीनाक्षी नटराजन के लिए यह मुकाबला उनकी राजनीतिक क्षमता की असली परीक्षा होगा, वहीं बीजेपी ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह अंतिम क्षण तक अपने पत्ते खोलने में माहिर है।



