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लद्दाख की आवाज़ सोनम वांगचुक: 21 दिन की भूख हड़ताल खत्म, पुलिस ने उठाया, अस्पताल में भर्ती – क्या है छठी अनुसूची का पूरा मामला?

दिल्ली के जंतर मंतर पर 21 दिनों से लद्दाख के हक के लिए आवाज़ उठा रहे जाने-माने शिक्षाविद् और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल अचानक खत्म हो गई। देर रात दिल्ली पुलिस ने उन्हें हिरासत में लेकर अस्पताल में भर्ती कराया है। इस कार्रवाई के बाद देश भर में लद्दाख की विशेष संवैधानिक सुरक्षा की मांग और नागरिक विरोध के अधिकार पर एक नई बहस छिड़ गई है।

वांगचुक ने लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर ‘क्लाइमेट फास्ट’ (जलवायु उपवास) शुरू किया था। उनका आरोप है कि केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद लद्दाख की अनूठी संस्कृति, पर्यावरण और जनजातीय पहचान खतरे में पड़ गई है।

अनशन से अस्पताल तक: वांगचुक का संघर्ष

सोनम वांगचुक, जिन्हें ‘थ्री इडियट्स’ फिल्म के प्रेरणास्रोत के रूप में भी जाना जाता है, अपनी भूख हड़ताल के दौरान लगातार अपनी सेहत की जानकारी दे रहे थे। उन्होंने एक वीडियो जारी कर बताया था कि उनका 9.5 किलोग्राम वजन घट गया है और शरीर का लगभग 20% हिस्सा प्रभावित हुआ है। उन्होंने कहा था, ‘मैं अभी जिंदा हूं, लेकिन मेरा शरीर धीरे-धीरे जवाब दे रहा है।’

पुलिस की कार्रवाई के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया। वांगचुक की पत्नी ने मीडिया से बात करते हुए चिंता जताई और मांग की कि उनकी सहमति के बिना उन्हें मुंह या नस के जरिए कुछ भी न दिया जाए। जंतर मंतर पर वांगचुक का समर्थन कर रहे कई CJP (लद्दाख के नागरिक समाज संगठन) कार्यकर्ताओं को भी पुलिस ने वहां से हटा दिया।

अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी गूंजी आवाज़

सोनम वांगचुक की इस लंबी भूख हड़ताल ने न सिर्फ भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान खींचा। बीबीसी जैसे प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने उनकी मांगों और लद्दाख के पर्यावरणीय मुद्दों पर खबरें प्रकाशित कीं। इससे लद्दाख के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र और स्थानीय लोगों के अधिकारों का मुद्दा वैश्विक मंच पर उठा।

क्या है छठी अनुसूची और लद्दाख की मांग?

भारतीय संविधान की छठी अनुसूची कुछ जनजातीय क्षेत्रों को विशेष प्रशासनिक अधिकार देती है, ताकि वे अपनी संस्कृति, भूमि और पहचान को बाहरी प्रभावों से बचा सकें। इसमें असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के जनजातीय क्षेत्र शामिल हैं।

लद्दाख को 2019 में जम्मू-कश्मीर से अलग कर एक केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था। इसके बाद से ही यहां के लोग, जिनमें सोनम वांगचुक प्रमुख हैं, यह मांग कर रहे हैं कि लद्दाख को भी छठी अनुसूची में शामिल किया जाए। उनका तर्क है कि लद्दाख की विशिष्ट भौगोलिक स्थिति, बौद्ध संस्कृति और जनजातीय आबादी को संरक्षित रखने के लिए यह आवश्यक है। उन्हें डर है कि विकास के नाम पर यहां की प्राकृतिक सुंदरता और स्थानीय लोगों के अधिकार खतरे में पड़ सकते हैं।

मायने और प्रभाव

सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल और उसके बाद हुई पुलिस कार्रवाई के कई गहरे मायने और दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं। यह घटना न केवल लद्दाख के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि भारत में नागरिक विरोध प्रदर्शनों और सरकार की प्रतिक्रिया पर भी सवाल उठाती है।

  • लद्दाख का भविष्य: यह घटना केंद्र सरकार पर लद्दाख की छठी अनुसूची की मांग पर गंभीरता से विचार करने का दबाव बढ़ाएगी। लद्दाख की पहचान और पर्यावरण की सुरक्षा का मुद्दा अब और मुखर हो गया है।
  • नागरिक आवाज़ का महत्व: वांगचुक जैसे प्रतिष्ठित व्यक्ति का 21 दिनों तक अनशन पर बैठना दर्शाता है कि स्थानीय मुद्दों पर नागरिक समाज की आवाज़ कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है। यह घटना अन्य क्षेत्रीय आंदोलनों को भी प्रेरित कर सकती है।
  • पर्यावरण और विकास का संतुलन: यह बहस फिर से सामने आई है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। लद्दाख जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में अनियंत्रित विकास के दुष्परिणामों को लेकर चिंताएं वाजिब हैं।
  • लोकतांत्रिक अधिकार: शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का अधिकार लोकतंत्र का एक अहम स्तंभ है। इस मामले में पुलिस की कार्रवाई पर भी सवाल उठ सकते हैं कि क्या सरकार ने नागरिक आवाज़ को दबाने की कोशिश की है।

अब देखना यह होगा कि दिल्ली पुलिस की इस कार्रवाई और सोनम वांगचुक के अस्पताल में भर्ती होने के बाद लद्दाख की मांग को लेकर सरकार का अगला कदम क्या होता है और यह मुद्दा किस दिशा में आगे बढ़ता है।

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