2022 फीफा वर्ल्ड कप फाइनल… अर्जेंटीना और फ्रांस के बीच मुकाबला… 90 मिनट का खेल 2-2 पर खत्म। फिर आया वो पल जिसने करोड़ों दिलों की धड़कनें बढ़ा दीं – ‘एक्स्ट्रा टाइम’। लियोनेल मेस्सी ने गोल दागा, किलियन एम्बाप्पे ने हैट्रिक पूरी की, और आखिरी पलों में एमी मार्टिनेज का वो ऐतिहासिक बचाव… ये सब ‘एक्स्ट्रा टाइम’ का ही कमाल था। अब जब 2026 वर्ल्ड कप के नॉकआउट मुकाबले शुरू हो चुके हैं, तो एक बार फिर सबकी निगाहें इस ‘अतिरिक्त समय’ पर टिक गई हैं।
फुटबॉल में एक्स्ट्रा टाइम क्या है, इसके नियम क्या हैं और क्यों यह खेल को इतना अप्रत्याशित बना देता है, आइए गहराई से जानते हैं।
एक्स्ट्रा टाइम क्या है?
आखिर क्या है यह ‘एक्स्ट्रा टाइम’? आसान शब्दों में समझें तो, फुटबॉल के नॉकआउट मैचों में जब 90 मिनट के निर्धारित समय में कोई टीम निर्णायक बढ़त नहीं बना पाती और स्कोर बराबर रहता है, तब विजेता तय करने के लिए 30 मिनट का अतिरिक्त खेल खेला जाता है। इसे ही ‘एक्स्ट्रा टाइम’ कहते हैं।
यह 30 मिनट का समय दो हिस्सों में बंटा होता है – 15-15 मिनट के दो हाफ। इन हाफ के अंत में स्टॉपेज टाइम भी जोड़ा जा सकता है। टीमों को एक अतिरिक्त सब्स्टीट्यूशन का मौका भी मिलता है, यानी कुल 6 बदलाव किए जा सकते हैं। अगर ‘एक्स्ट्रा टाइम’ के बाद भी स्कोर बराबर रहता है, तो फिर मैच का फैसला पेनल्टी शूटआउट से होता है।
स्टॉपेज टाइम से कैसे अलग है एक्स्ट्रा टाइम?
कई बार लोग ‘एक्स्ट्रा टाइम’ और ‘स्टॉपेज टाइम’ को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन दोनों में बड़ा अंतर है। स्टॉपेज टाइम, जिसे इंजरी टाइम भी कहते हैं, हर हाफ के अंत में जोड़ा जाता है। यह खिलाड़ियों के चोटिल होने, सब्स्टीट्यूशन, गोल सेलिब्रेशन या समय बर्बाद करने में लगे समय की भरपाई के लिए होता है।
वहीं, ‘एक्स्ट्रा टाइम’ सिर्फ नॉकआउट मैचों में तब खेला जाता है जब 90 मिनट के खेल के बाद भी कोई विजेता न मिले। यह खेल का एक तयशुदा अतिरिक्त चरण है, जबकि स्टॉपेज टाइम सिर्फ खेल में हुए व्यवधानों की भरपाई है।
एक्स्ट्रा टाइम का इतिहास: गोल्डन गोल से सिल्वर गोल तक
‘एक्स्ट्रा टाइम’ का कॉन्सेप्ट फुटबॉल में नया नहीं है। 1875 के एफए कप फाइनल में पहली बार इसका इस्तेमाल हुआ था, जब रॉयल इंजीनियर्स और ओल्ड ईटोनियंस के बीच मैच 1-1 से ड्रॉ रहा था। तब पेनल्टी शूटआउट नहीं थे, इसलिए मैच दोबारा खेला गया।
फीफा वर्ल्ड कप में 1930 से ही ‘एक्स्ट्रा टाइम’ का चलन है। 1990 के दशक में ‘गोल्डन गोल’ का नियम भी आया, जिसमें ‘एक्स्ट्रा टाइम’ में पहला गोल करने वाली टीम तुरंत जीत जाती थी। इसका मकसद खेल को और रोमांचक बनाना था, लेकिन अक्सर टीमें हार के डर से रक्षात्मक हो जाती थीं। 2006 वर्ल्ड कप से इसे हटा दिया गया और पारंपरिक ‘एक्स्ट्रा टाइम’ नियम वापस आ गए। ‘सिल्वर गोल’ का भी एक छोटा सा प्रयोग हुआ था, पर वह वर्ल्ड कप में कभी लागू नहीं हुआ।
कितना आम है एक्स्ट्रा टाइम?
पिछले तीन वर्ल्ड कप में 17 नॉकआउट मैच ‘एक्स्ट्रा टाइम’ तक गए हैं, जो कुल मैचों का 35% है। वर्ल्ड कप फाइनल की बात करें तो, कुल 22 में से 8 फाइनल ‘एक्स्ट्रा टाइम’ तक पहुंचे हैं, जिनमें से तीन तो पिछले चार वर्ल्ड कप में ही हुए। 2010 में स्पेन, 2014 में जर्मनी और 2022 में अर्जेंटीना ने ‘एक्स्ट्रा टाइम’ या उसके बाद पेनल्टी से खिताब जीता।
1966 में इंग्लैंड की एकमात्र वर्ल्ड कप जीत भी ‘एक्स्ट्रा टाइम’ के दम पर ही आई थी, जब ज्योफ हर्स्ट ने हैट्रिक जमाकर टीम को वेस्ट जर्मनी के खिलाफ जीत दिलाई थी। 2026 वर्ल्ड कप में टीमों की संख्या बढ़ने से, ‘एक्स्ट्रा टाइम’ में जाने वाले मैचों की संख्या भी बढ़ने की पूरी संभावना है।
क्या एक्स्ट्रा टाइम हमेशा मनोरंजक होता है?
‘एक्स्ट्रा टाइम’ अक्सर रोमांच की पराकाष्ठा होता है, लेकिन कभी-कभी खिलाड़ियों की थकान के कारण खेल की गति धीमी भी हो जाती है। पिछले कुछ टूर्नामेंट्स में, ‘एक्स्ट्रा टाइम’ में गए 17 मैचों में से सिर्फ 5 में ही अतिरिक्त समय में गोल हो पाया। 10 मैचों में कोई गोल नहीं हुआ।
इसके बावजूद, ‘एक्स्ट्रा टाइम’ फुटबॉल प्रशंसकों के लिए एक अनूठा अनुभव है। यह खिलाड़ियों के धैर्य, शारीरिक क्षमता और मानसिक दृढ़ता की असली परीक्षा होती है। एक छोटी सी गलती हार का कारण बन सकती है, और एक शानदार पल इतिहास रच सकता है।
मायने और प्रभाव
फुटबॉल में एक्स्ट्रा टाइम सिर्फ खेल का एक नियम नहीं, बल्कि भावनाओं का एक ज्वार है। यह खिलाड़ियों के लिए शारीरिक और मानसिक चुनौती है, क्योंकि 90 मिनट के बाद 30 मिनट का अतिरिक्त खेल शरीर को निचोड़ देता है। इससे चोटों का खतरा भी बढ़ता है और कोचों को अपनी रणनीति में तुरंत बदलाव करने पड़ते हैं।
आम जनता और खासकर फुटबॉल प्रेमियों के लिए, ‘एक्स्ट्रा टाइम’ मैच को अप्रत्याशित बना देता है। जब मुकाबला बराबरी पर होता है, तो हर पास, हर टैकल, हर शॉट की अहमियत बढ़ जाती है। स्टेडियम में मौजूद दर्शक हों या टीवी पर देख रहे करोड़ों लोग, हर कोई सांसें थामे रहता है। यह तनाव और रोमांच का ऐसा मेल है, जो इस खूबसूरत खेल को और भी दिलकश बनाता है। वर्ल्ड कप जैसे बड़े टूर्नामेंट्स में, ‘एक्स्ट्रा टाइम’ अक्सर यादगार पलों और ऐतिहासिक जीतों का गवाह बनता है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी याद रखे जाते हैं। यह दिखाता है कि हार न मानने की भावना क्या कर सकती है।
Image Source: www.nytimes.com



