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CAG का बड़ा खुलासा: कोच्चि नगर निगम मुख्यालय परियोजना में 17 साल की देरी, लागत तिगुनी और जनता के पैसों की बर्बादी!

कल्पना कीजिए, एक सरकारी इमारत बनने में 17 साल लग जाएं और उसकी लागत तीन गुना बढ़कर 18 करोड़ से सीधे 61 करोड़ पहुंच जाए, फिर भी काम अधूरा रहे! यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि केरल के कोच्चि शहर में नगर निगम के नए मुख्यालय की हकीकत है, जिस पर देश की सर्वोच्च ऑडिट संस्था CAG (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) ने अपनी रिपोर्ट में तीखे सवाल उठाए हैं। यह रिपोर्ट सिर्फ कागजी खानापूर्ति नहीं, बल्कि जनता के पैसों की बर्बादी और सरकारी परियोजनाओं के लचर प्रबंधन का जीता-जागता प्रमाण है।

17 साल, तीन गुना लागत: कोच्चि मुख्यालय का अधूरा सपना

कोच्चि नगर निगम के नए मुख्यालय का उद्घाटन अक्टूबर 2025 में हुआ, लेकिन CAG की रिपोर्ट बताती है कि यह परियोजना अपने निर्धारित समय से करीब 17 साल पीछे चल रही है। 2006 में जब इसे मंजूरी मिली थी, तब इसकी लागत 18.83 करोड़ रुपये आंकी गई थी और इसे 20 महीनों में पूरा होना था। लेकिन आज, इसकी लागत लगभग 61 करोड़ रुपये हो चुकी है, यानी मूल अनुमान से लगभग तीन गुना ज्यादा।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बाद भी इमारत का काम पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। रिपोर्ट में 2020-21 से 2022-23 की अवधि के लिए स्थानीय निकायों के प्रदर्शन का ऑडिट किया गया है, और इस दौरान भी भवन अधूरा ही था।

CAG रिपोर्ट की तीखी आलोचना

CAG की रिपोर्ट ने इस परियोजना में लगातार हो रही देरी और लागत में अप्रत्याशित वृद्धि को लेकर कोच्चि नगर निगम की जमकर आलोचना की है। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि बार-बार अनुमानों में बदलाव, काम की धीमी गति और पर्याप्त धन की कमी के कारण यह परियोजना 17 साल बाद भी पूरी नहीं हो पाई है, और लागत लगातार बढ़ती जा रही है।

सरकार ने नवंबर 2024 में दावा किया था कि इमारत अपने अंतिम चरण में है और जनवरी 2025 तक पूरी हो जाएगी। हालांकि, CAG रिपोर्ट के अनुसार, 17 साल बाद भी परियोजना के पूरी न होने पर सरकार की ओर से कोई ठोस जवाब नहीं दिया गया।

कहां फंसा पेंच? विवादों और बदलावों का लंबा सफर

इस परियोजना की शुरुआत से ही विवादों का साया रहा है। जुलाई 2006 में प्रशासनिक स्वीकृति मिलने के बाद, काम शुरू तो हुआ लेकिन अप्रैल 2008 में ठेकेदार ने काम रोक दिया। वजह थी निगम द्वारा अनुमानों में कई बदलाव, जिससे विवाद पैदा हो गया। ठेकेदार को इस दौरान 6.10 करोड़ रुपये का भुगतान भी किया जा चुका था।

निगम ने ठेकेदार के जोखिम पर अनुबंध समाप्त करने का फैसला किया, लेकिन केरल हाईकोर्ट ने ठेकेदार की याचिका पर अलग निर्देश दिए। नतीजतन, मई 2015 में बचे हुए काम के लिए उसी ठेकेदार को संशोधित अनुमान 18.70 करोड़ रुपये के साथ फिर से काम सौंपा गया।

पानी-पानी बेसमेंट और अधूरे काम

देरी और लागत वृद्धि का सिलसिला यहीं नहीं रुका। जुलाई 2018 में फिर से अनुमानों में बदलाव हुआ और लागत बढ़कर 24.71 करोड़ रुपये हो गई। दिसंबर 2024 तक, 25.70 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद इमारत अधूरी ही थी। उस महीने हुए संयुक्त भौतिक सत्यापन में ऑडिट अधिकारियों ने बेसमेंट में डेढ़ फीट तक पानी भरा पाया, जबकि ठेकेदार को साल भर पहले ही रिसाव की समस्या ठीक करने का निर्देश दिया गया था। लेकिन यह सुधार कभी हुआ ही नहीं।

मायने और प्रभाव: जनता के पैसों की जवाबदेही

यह मामला सिर्फ एक इमारत के बनने में देरी का नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र में जवाबदेही की कमी और जनता के गाढ़े खून-पसीने की कमाई की बर्बादी का प्रतीक है। कोच्चि के आम नागरिक के लिए इसका सीधा मतलब है कि उनके टैक्स का पैसा कैसे लापरवाही और अक्षमता की भेंट चढ़ जाता है। जब एक नगर निगम का मुख्यालय ही 17 साल में नहीं बन पाता, तो आम जनता को मिलने वाली अन्य सुविधाओं और परियोजनाओं की क्या स्थिति होगी, यह सवाल उठना लाजिमी है।

यह CAG रिपोर्ट स्थानीय निकायों के परियोजना प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े करती है और यह भी बताती है कि कैसे शुरुआती अनुमानों को दरकिनार कर लगातार लागत बढ़ाई जाती है। सरकार और स्थानीय प्रशासन को इस पर गंभीरता से विचार करना होगा और ऐसी परियोजनाओं में पारदर्शिता व समयबद्धता सुनिश्चित करनी होगी, ताकि भविष्य में जनता के पैसे का ऐसा दुरुपयोग न हो। यह घटना पूरे केरल में सरकारी परियोजनाओं के क्रियान्वयन की गुणवत्ता पर एक बड़ी बहस छेड़ सकती है।

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