फिल्म ‘पुष्पा’ में चंदन की लकड़ियों की तस्करी का वो दृश्य याद है आपको? आंध्र प्रदेश के शेषचलम जंगलों से लाल चंदन की अवैध कटाई और तस्करी एक वक्त पर हकीकत थी, जिसने इन पवित्र पहाड़ियों को वीरान कर दिया था। लेकिन आज कहानी कुछ और है। भगवान वेंकटेश्वर के पावन धाम तिरुपति और उसके आसपास की शेषचलम पहाड़ियां अब 90% तक हरी-भरी हो चुकी हैं। यह किसी चमत्कार से कम नहीं, और इस बदलाव के पीछे है तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (TTD) का अथक प्रयास।
शेषचलम: तस्करी से हरियाली तक का सफर
एक समय था जब शेषचलम के घने जंगल, जो तिरुपति बालाजी मंदिर को घेरे हुए हैं, लाल चंदन (रेड सैंडर्स) की अवैध कटाई और चीन जैसे देशों में उसकी तस्करी का गढ़ बन गए थे। राज्य के वन विभाग और पुलिस के लिए यह सालों तक एक बड़ी चुनौती रही। इन गतिविधियों से आंध्र प्रदेश की यह बेशकीमती वन संपदा लगातार घट रही थी।
परंपराओं और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ साधते हुए, टीटीडी ने इस चुनौती का सामना किया। उनके प्रयासों से आज यह मंदिर नगरी और उससे सटी पहाड़ियां लगभग 90 प्रतिशत हरियाली से आच्छादित हैं। यह आंकड़ा देश के अन्य प्रमुख संस्थानों के लिए एक मिसाल बन गया है।
टीटीडी का वन विभाग: एक विशाल हरित अभियान
तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम का वन विभाग कुल 2,719 हेक्टेयर (लगभग 6,720 एकड़) वन क्षेत्र की देखरेख करता है। भारत वन स्थिति रिपोर्ट के अनुसार, इस क्षेत्र का 89.4 प्रतिशत हिस्सा टीटीडी की सीमाओं के भीतर दर्ज है, जो इसे देश में हरियाली प्रबंधन में अग्रणी बनाता है। टीटीडी के अधिकारी बताते हैं कि लगभग 2,431 हेक्टेयर वनस्पति के अंतर्गत है, जो कार्बन भंडारण, जलवायु विनियमन और जैव विविधता संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।
वर्ष 1980 से ही यह विभाग शेषचलम पहाड़ियों की समृद्ध वन संपदा की रक्षा कर रहा है। इसका उद्देश्य लाखों भक्तों की आध्यात्मिक जरूरतों को पूरा करते हुए पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखना है। एक उप वन संरक्षक की देखरेख में यह विभाग काम करता है, जिसमें तिरुमाला और तिरुपति में दो-दो वन रेंज शामिल हैं।
चौबीसों घंटे निगरानी और सुरक्षा
मैदान स्तर पर, उप रेंज अधिकारी, वन अनुभाग अधिकारी और सहायक कर्मचारी वन सुरक्षा गतिविधियों का समन्वय करते हैं। इसमें पेड़ों की कटाई और अवैध शिकार को रोकने के लिए चौबीसों घंटे गश्त शामिल है। वन अग्नि को रोकने के लिए फायर लाइनें बनाई जाती हैं और प्रशिक्षित टीमें त्वरित प्रतिक्रिया के लिए तैयार रहती हैं।
जैव विविधता संरक्षण और देशी वृक्षारोपण
जैव विविधता संरक्षण के तहत, टीटीडी ने बबूल (अकेशिया) को देशी वनस्पतियों से बदलने की पहल की है। इसके तहत 576 हेक्टेयर क्षेत्र में चरणबद्ध तरीके से पीपल, बरगद, गूलर, आंवला, चंपा, आम, चंदन, लाल चंदन, जामुन जैसे पौधे लगाए जा रहे हैं। अब तक 22 हेक्टेयर क्षेत्र को इस अभियान के तहत कवर किया जा चुका है।
चारों वन रेंजों में विशेष नर्सरी भी स्थापित की गई हैं। इन नर्सरियों में देशी प्रजातियों, सजावटी पौधों और औषधीय पौधों के गुणवत्तापूर्ण पौधे उगाए जाते हैं, जो वन पुनर्स्थापन कार्यक्रमों के लिए आवश्यक हैं।
मुख्यमंत्री की सराहना और परंपरा का सम्मान
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने टीटीडी की इन उपलब्धियों की सराहना की है। उन्होंने कहा, “हमारी परंपराएं प्रकृति को पवित्र मानती हैं, और जंगलों व वन्यजीवों की रक्षा करना ईश्वर की सेवा है। मैं इन प्रयासों की सराहना करता हूं, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक हरा-भरा और स्वस्थ तिरुमाला बनाए रखने में मदद करेंगे।”
मानव-वन्यजीव संघर्ष और भक्तों की सुरक्षा
शेषचलम के जंगल हाथियों, तेंदुओं, भालुओं और सांपों सहित कई वन्यजीवों का घर भी हैं। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने और घायल जानवरों को बचाने के लिए विशेष उपायों की आवश्यकता होती है। तिरुपति शहर से तिरुमाला तक 11 किलोमीटर की पहाड़ी यात्रा में तेंदुओं और कभी-कभी भालुओं का दिखना एक डरावना पहलू बन गया था।
तीन साल पहले, बच्चों पर हुए दो तेंदुए हमलों के बाद स्थिति और गंभीर हो गई थी, जिसमें एक छह साल की बच्ची की मौत हो गई थी। इसके बाद टीटीडी ने भक्तों को जानवरों के हमलों से बचने के लिए लाठी देना शुरू किया। भक्तों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तिरुमाला में तीन सांप बचाव दल भी तैनात किए गए हैं। वन विभाग मार्ग में खतरनाक पेड़ों की पहचान कर उनकी छंटाई भी करता है। वन्यजीव संस्थान के सहयोग से संघर्ष शमन कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं।
मंदिर अनुष्ठानों और आयुर्वेद में योगदान
वन विभाग मंदिर के अनुष्ठानों के लिए आवश्यक चंदन की लकड़ी, जलाऊ लकड़ी, दर्भा घास और अन्य सामग्री भी उपलब्ध कराता है। यह सड़क डिवाइडरों और उद्यानों का रखरखाव करता है, साथ ही तिरुमाला और तिरुपति में हरियाली विकास कार्यक्रम भी चलाता है।
अधिकारियों का कहना है कि दुर्लभ और औषधीय पौधों के संरक्षण तथा आयुर्वेद के लिए कच्चे माल की आपूर्ति पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। पवित्र वनम, दिव्य औषधि वनम और पालमनेरू टिम्बर प्लांटेशन जैसी परियोजनाएं इस कार्य में मदद कर रही हैं। टीटीडी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “हमारा उद्देश्य इस पवित्र वन संपदा को संरक्षित करना और इस अमूल्य प्राकृतिक विरासत को भावी पीढ़ियों तक पहुंचाना है।”
मायने और प्रभाव: आपके लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह खबर?
तिरुपति में टीटीडी का यह पर्यावरण संरक्षण अभियान केवल पेड़ों को लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके गहरे मायने और व्यापक प्रभाव हैं जो आम जनता को सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं:
- स्वच्छ पर्यावरण और स्वास्थ्य: शेषचलम पहाड़ियों की बढ़ती हरियाली का मतलब है स्वच्छ हवा, बेहतर जल संरक्षण और नियंत्रित जलवायु। यह स्थानीय निवासियों और यहां आने वाले लाखों भक्तों के स्वास्थ्य के लिए सीधे तौर पर फायदेमंद है।
- धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व: तिरुपति बालाजी मंदिर करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। इस पवित्र स्थल के आसपास के पर्यावरण का संरक्षण करना धार्मिक परंपराओं का सम्मान करना है। यह भक्तों को एक शांत और पवित्र वातावरण प्रदान करता है, जिससे उनकी आध्यात्मिक यात्रा और समृद्ध होती है।
- वन्यजीवों का संरक्षण: मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के प्रयास और वन्यजीवों के लिए सुरक्षित आवास का निर्माण जैव विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह दिखाता है कि विकास और पर्यावरण एक साथ चल सकते हैं।
- सुरक्षा और पर्यटन: भक्तों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किए गए उपाय, जैसे लाठी वितरण और सांप बचाव दल, यात्रा को सुरक्षित बनाते हैं। एक सुरक्षित और हरा-भरा वातावरण अधिक पर्यटकों और भक्तों को आकर्षित करता है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलता है।
- प्रेरणा और मिसाल: टीटीडी का यह मॉडल अन्य बड़े धार्मिक और सार्वजनिक संस्थानों के लिए एक प्रेरणा है। यह दिखाता है कि कैसे बड़े पैमाने पर पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को सफलतापूर्वक लागू किया जा सकता है, जिससे समाज और प्रकृति दोनों को लाभ हो।
- स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा: चंदन, औषधीय पौधों और अन्य वन उत्पादों का स्थायी प्रबंधन न केवल मंदिर की जरूरतों को पूरा करता है बल्कि स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा कर सकता है।
संक्षेप में, टीटीडी का यह कदम केवल वृक्षारोपण नहीं, बल्कि एक समग्र दृष्टिकोण है जो आस्था, पर्यावरण, सुरक्षा और विकास को एक साथ पिरोता है। यह तिरुपति को एक ऐसे मॉडल शहर के रूप में स्थापित करता है जहां आध्यात्मिकता और प्रकृति का सम्मान एक-दूसरे के पूरक हैं।
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